भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 456

४७२ चरकसंहिता [ अ० १० में 'अतत्त्वाभिनिवेश' नामक जो महारोग कहा हे, उसकी आकृति, लक्षण, हेतु वक्ष पर आपने नहीं कहे थे, उनको मैं सुनना चाहता हूँ। उसे आप यहा पर कहिये। सुनने की इच्छा वाले शिष्य के वचन को सुन कर भगवान् महर्षि ने कहा—॥ ५३-५४ ॥ महागदं सौम्य शृणु सहेत्वाकृतिभेषजम् । मलिनाहारशीलस्य वेगान्प्राप्तान्निगृह्णतः । शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैर्हेतुभिश्चातिसेवितैः ॥ ५५ ॥ हृदयं समुपाश्रित्य मनोबुद्धिवहाः सिराः । दोषाः संदूष्य तिष्ठन्ति रजोमोहावृतात्मनः ॥ ५६ ॥ हे सौम्य ! महागद के हेतु, लक्षण ओर चिकित्सा को सुनो—जो व्यक्ति नित्यप्रति मलिन (अपवित्र) और अपथ्य आहार का सेवन करता है, मूत्र, पुरीष आदि के उपस्थित वेगो को रोकता है, शत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष आदि कारणो को अति सेवन करता है रजोग्रस्त और मो-(तम) से आवृत उस पुरुष मे प्रकुपित शारीरिक वात आदि दोष हृदय मे पहुँच कर मनोवह और बुद्धि-वह (सज्ञावह), सिराओ (स्रोतो) को दूषित कर देते है ॥५५-५६॥ रजस्तमोभ्यां वृद्धाभ्यां बुद्धौ मनसि चाऽऽवृते । हृदये व्याकुले दोषैरथ मूढालपचेतसः ॥ ५७ ॥ करोति विषमां बुद्धिं नित्यानित्ये हिताहिते । अतत्त्वाभिनिवेशं तमाहुराप्ता महागदम् ॥ ५८ ॥ रज और तम रूपी मानस दोषो के अधिक बढने से सत्त्व-सञ्ज्ञक मन और बुद्धि घिर जाते है, ढप जाते है। शारीरिक दोषों के बढने से हृदय व्याकुल हो जाता है। इस अवस्था मे पुरुष को मोह (मूर्च्छा) आ जाती है, चेतना कम हो जाती है, नित्य, अनित्य और हित, अहित कार्यों मे विपरीत बुद्धि करने लगता है। आप्त विद्वान् इसको 'अतत्त्वाभिनिवेश' नामक महाराग कहते हैं ॥ ५७-५८ ॥ स्नेहस्वेदोपपन्नं तं संसाध्य वमनादिभिः । कृतसंसर्जनं मेध्यैरन्नपानैरुपाचरेत् ॥ ५६ ॥ चिकित्सा—रोगी को प्रथम स्नेहन और स्वेदन कराके वमन आदि क्रियाओ से शुद्ध करे। पीछे से अग्नि को बढाने के लिये पेया आदि कर्म तथा मेधावर्धक, पवित्र अन्नपानो से चिकित्सा करे ॥५६॥