भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 457

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७३ ब्राह्मीस्वरसयुक्तं यत् १ पञ्चगव्यमुदाहृतम् । तत्सेव्यं शङ्खपुष्पी च यच्च मेध्यं २ रसायनम् ॥ ६० ॥ ब्राह्मी के ( कूठ आदि से मिले ) स्वरस से युक्त जो पंचगव्य घृत प्रथम कहा है, उसका सेवन करना चाहिये । शंखपुष्पी का स्वरस और जो मेधावर्धक रसायन प्रथम कहे है, उनका सेवन करना चाहिये ॥६०॥ सुहृदश्चानुकूलास्तं स्वाप्तधर्मार्थवादिनः । संयोजयेयुर्विज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ॥ ६१ ॥ मन के अनुकूल अच्छे आप्त, धर्म और हित की बात कहने वाले मित्र लोग उस रोगी को विज्ञान ( शिल्प-शास्त्र ), धैर्य ( चित्त की स्थिरता ), स्मृति ( भूतार्थ-विज्ञान ) और समाधि ( मन के नियमन ) मे लगावे ॥६१॥ प्रयुञ्ज्यात्तैललशुनं पयसा वा शतावरीम् । ब्राह्मीरसं कुष्ठरसं वचा वा मधुसंयुताम् ॥ ६२ ॥ ( १ ) तिल तैल के साथ मिला लहसुन का रस प्रतिदिन सेवन करे । ( २ ) शतावरी के रस का दूध के साथ ले, ( ३ ) ब्राह्मी स्वरस, ( ४ ) कूट के स्वरस, या ( ५ ) वच के चूर्ण को मधु के साथ प्रयोग करे ये पाच योग है ॥ ६२ ॥ दुश्चिकित्स्यो ह्यपस्मारश्चिरकारी कृतास्पदः । तस्माद्रसायनैरेनं प्रायशः समुपाचरेत् ॥ ६३ ॥ अपस्मार रोग मे शारीरिक और मानसिक दोष एक साथ कुपित होते है और वह महामर्मों मे आश्रित होता है । और यदि यह रोग देह मे एक बार स्थान पा जावे और चिरस्थायी हो जावे तो वह अति कष्टसाध्य हो जाता है । इसलिये इस अपस्मार की प्रायः अनेक रसायनो से चिकित्सा करे ॥६३॥ जलाग्निद्रुमशैलेभ्यो विषमेभ्यश्च तं सदा । रक्षेदुन्मादिनं चैव सद्यः प्राणहरा हि ते ॥ ६४ ॥ अपस्मार और उन्माद के रोगियो की जल, अग्नि, वृक्ष, पर्वत और अन्य विषम स्थानो से सदा रक्षा करे । क्योकि इन का देखने मात्र से उत्पन्न हुआ वेग प्राणघातक होता है ॥ ६४ ॥ तत्र श्लोकौ—हेतुः कुर्वन्त्यपस्मारं दोषाः प्रकुपिता यथा । सामान्यतः पृथक्त्वाच्च लिङ्गं तेषां च भेषजम् ॥६५॥ १. 'स्वरसंयुक्त' इति । २ 'सेव्यं' इति वा ।