चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 461, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७७ ( मन्दाग्नि ) हो तो लाख का सुरा के साथ पीवे । यदि रोगी को अतीसार हो तो लाख को मांथा, अतीस, पाठा और इन्द्रजौ के काथ ( काढे ) के साथ पीवे ॥ १६ ॥ लाक्षा सर्पिर्मधूच्छिष्ट जीवनीयगण सिताम् । त्वक्क्षीरीसंमितं क्षीरे पक्त्वा दीप्तानलः पिबेत् ॥ १७ ॥ ( ३ ) दीप्ताग्नि रोगी लाख, घी, मोम, जीवनीय गण की औषधिया, मिश्री त्वक्क्षीरी ( वंशलोचन ) और समिता ( गोधूम, गेहूँ का चूर्ण ) को दूध से पका कर पीये ॥ १७ ॥ इक्ष्वालिकविसग्रन्थिपद्मकेशरचन्दनैः । श्रुतं पयो मधुयुतं सन्धानार्थं पिबेत्क्षती ॥ १८ ॥ ( ४ ) उरःक्षत रोगी सन्धान के लिये इक्षुवालिका, बिस (मृणाल की जड) ग्रन्थि ( पिप्पली मूल ), पद्मकेसर ओर चन्दन इनसे पकाये दूध मे मधु मिला कर पिये ॥ १८ ॥ यवानां चूर्णमादाय क्षीरसिद्धं घृतप्लुतम् । ज्वरे दाहे सिताक्षौद्रसक्तून् वा पयसा पिबेत् ॥ १६ ॥ ( ५ ) उरःक्षत मे ज्वर और दाह होने पर आम (अग्नि पर न भुने, कच्चे ) जौ के चूर्ण को चौगुने दूध मे पका कर घी मे मिला कर शर्करा ( शक्कर ) और मधु के साथ खावे । अथवा शक्कर और मधु से मिले जौ के सत्तूओ को दूध मे मिला कर खावे ॥ १६ ॥ कासी पर्वास्थिशूली च लिह्यात्सघृतमाक्षिकाः । मधूकमधुकद्राक्षात्वक्क्षीरीपिप्पलीबलाः ॥ २० ॥ ( ६ ) कास, पार्श्वशूल, पोरुओ मे पीडा और अस्थिशूल होने पर महुए के फूल, मुलहठी, द्राक्षा, वसलोचन, पिप्पली और बला इनके चूर्ण को घी और शहद मे मिला कर चाटे ॥ २० ॥ एलापत्रत्वचोऽर्धांशाः पिपल्यर्धपलं तथा । सितामधुकखर्जूरमृद्वीकाश्च पलोन्मिताः ॥ २१ ॥ संचूर्ण्य मधुना युक्ता गुलिकाः संप्रकल्पयेत् । अक्षमात्रा ततश्चैका भक्षयेन्ना दिने दिने ॥ २२ ॥ कासं श्वास ज्वर हिक्का छर्दिमूर्च्छा मदं भ्रमम् । रक्तनिष्ठीवनं तृष्णां पार्श्वशूलमरोचकम् ॥ २३ ॥ शोषप्लीहाढ्यवातांश्च स्वरभेदं क्षतं क्षयम् ।