चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 462, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें४७८ चरकसंहिता [ अ० ११
गुलिका तर्पणी वृष्या रक्तपित्तं च नाशयेत् ॥ २४ ॥ इत्येलादिगुटिका । (७) एलादि गुटिका—छोटी इलायची, पत्र (तेजपात), त्वच (दाल- चीनी) ये प्रत्येक आधा कर्ष, पिप्पली आधा पल, शर्करा, मुलहठी, खजूर, द्राक्षा (दाख) प्रत्येक एक-एक पल इन सब का चूर्ण करके मधु के साथ गोलिया बनावे । रोगी को चाहिये कि प्रतिदिन एक कर्ष परिमित गुटिका खाये। ये गुटिकाये तर्पणी (वृष्य) है। कास, श्वास, ज्वर, हिचकी, वमन, मूर्च्छा, मद श्रम, रक्तवमन, प्यास, पार्श्वशूल, अरोचक, शोष, प्लीहा, आढ्यवात, स्वरभेद, क्षत, क्षय और रक्तपित्त को नष्ट करती है ॥ २१-२४ ॥ रक्तेऽतिवृत्ते दक्षाण्डं यूषेस्तोयेन वा पिबेत् । चटकाण्डरसं वाऽपि रक्तं वा छागजाङ्गलम् ॥ २५ ॥ (८) रक्त के अधिक आने पर कुक्कुट के अण्डों को मूग आदि के यूष (रस) के साथ अथवा जल के साथ पीवे । अथवा चटक (चिडिया) के अण्डे के रस को यूष के साथ पीवे, बकरी या हरिण आदि जंगली पशुओ के रक्त को पीवे ॥ २५ ॥ चूर्णं पौनर्नवं रक्तशालितण्डुलशर्करम् । रक्तष्ठीवी पिबेत्सिद्धं द्राक्षारसपयोघृतैः ॥ २६ ॥ मधूकमधुकक्षीरसिद्धं वा तण्डुलीयकम् । (६) रक्त मिश्रित थूक आने पर—शर्करा, पुनर्नवा और लाल चावलो का चूर्ण मिला कर खावे । द्राक्षा रस, दूध, घी इनके साथ सिद्ध करके पीवे । अथवा महुवे का फूल, गुलहठी, इनका क्वाथ, क्वाथ के समान दूध, इनमे तण्डु- लीयक (चौलाई) सिद्ध करके पीवे ॥ २६ ॥ मूढवातस्त्वजामेदः सुराभृष्टं ससैन्धवम् ॥ २७ ॥ क्षामः क्षीणः क्षतोरस्कस्त्वनिद्रः सबलेऽनले । श्रुतक्षीरसरेणाद्यात्सक्षाौद्रघृतशर्करम् ॥ २८ ॥ (१०) उर क्षत रोगी मे यदि वायु अनुलोम-मार्ग से प्रवृत्त न हो तो सुरा मे भुनी अजा की वसा (चर्बी) को सैन्धे नमक के साथ सेवन करे । यदि उरःक्षत-रोगी क्षाम (क्लान्त) और क्षीण शरीर हो, अग्नि प्रबल हो और नींद न आती हो तो अजा-मेद (बकरे की चर्बी) को पके हुए दूध के सर भाग (मलाई) के साथ मिला कर घी, मधु, शर्करा के साथ खावे ॥२७-२८॥ शर्करा च यवक्षौद्रजीवकर्षभकौ मधु ।