चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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अ० ११] चिकित्सितस्थानम् ४७६
शृतक्षीरानुपानं वा लिह्यात्क्षीणः क्षतः कृशः ॥ २९ ॥
क्रव्यादामासनिर्यूहं घृतभृष्टं पिवेच्च सः ।
पिप्पलीक्षौद्रसंयुक्तं मासशोणितवर्धनम् ॥ ३० ॥
(११) कृश और क्षीण उरःक्षत-रोगी जो, गेहूँ, जीवक, ऋषभक इनके
चूर्ण को शर्करा के समान भाग लेकर मधु के साथ चाटे। ऊपर से गरम दूध
पीवे, मांस और रक्त बढ़ाने वाले मांसभक्षी पशु-पक्षियो के मांस के रस को
म भून कर पिप्पली-चूर्ण और मधु के साथ मिला कर खावे ॥२९-३०॥
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षशालप्रियङ्गुभिः ।
तालमस्तकजम्बूत्वक्प्रियालैश्च सपद्मकैः ॥ ३१ ॥
साश्वकर्णैः शृतात्क्षीराद्दध्नाज्जातेन सर्पिषा ।
शाल्योदनं क्षतोरस्कः क्षीणशुक्रश्च मानवः ॥ ३२ ॥
(१२) उरःक्षत और क्षीणशुक्र पुरुष वट, गूलर, पीपल, पिलखन, साल
प्रियङ्गु, ताड का मस्तक, जामुन की छाल, पियाल, पद्माख, अश्वकर्ण (पीतशाल)
इनका समान भाग लेकर उनके कल्क के साथ पके दूध मे से निकले घी के
साथ चावल खाये ॥३१-३२॥
यष्ट्याह्वानागबलयोः क्वाथे क्षीरसमं घृतम् ।
पयस्यापिप्पलीवाशीकल्कसिद्धं क्षते शुभम् ॥ ३३ ॥
(१३) मुलहठी और नागबला का क्वाथ (एक तृतीयांश रहने पर),
दूध, घी के समान, कल्क Callback, पयस्या (क्षीरकाकोली), पिप्पली, वंशलोचन
इनके कल्क से दूध के समान घृत (एक भाग) सिद्ध करे। यह घृत उरःक्षत
में उपयोगी है ॥ ३३ ॥
कोललाक्षारसे तद्वत्क्षीराष्टगुणसाधितम् ।
कल्कैः कट्वङ्गदार्बीत्वग्वत्सकत्वक्फलैर्घृतम् ॥ ३४ ॥
(१४) कोल (सूखे बेर) और लाक्षा रस (अथवा क्वाथ) और घी से
आठ गुणे दूध मे, कट्वङ्ग (श्यानाक), दारुहल्दी की छाल, कूडे की छाल, इन्द्रजौ
इनके कल्क से घृत सिद्ध करे। यह घृत उरःक्षत मे हितकारी है १॥ ३४ ॥
जीवकर्षभकौ वीरां जीवन्तीं नागरं शटीम् ।
चतस्रः पर्णिनीर्मेदे काकोल्यौ द्वे निदिग्धिके ॥ ३५ ॥
पुनर्नवे द्वे मधुकमात्मगुप्ता शतावरीम् ।
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१ अष्टांगसंग्रह मे अष्टगुण दूध का ही विधान है। यथा—
घृतं वाष्टगुणे क्षीरे कोललाक्षारसान्वितम् ॥