चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 467, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८३ वशलोचन, पिप्पला, लाजा इनके चूर्णो से गाढा ( घन ) पान बना कर सेवन करावे ॥ ५४ ॥ सर्पिर्गुडान् समध्वक्षाञ्जग्ध्वा चानु पयः पिवेत् । रेतो वीर्य बलं पुष्टिं तैराशुतरमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥ ( २० ) सर्पिर्गुड— ( १ ) वशलोचन, पिप्पली और लाजा चूर्ण से बने बनाये घृतो को मधु के साथ सेवन करे पीछे से दूध पीवे । इस प्रकार करने से शुक्र, सामर्थ्य, बल और पुष्टि शीघ्र प्राप्त होती है ॥ ५५ ॥ बला विदारी ह्रस्वा च पञ्चमूली पुनर्नवा । पञ्चानां क्षीरिवृक्षाणा शुङ्गा मुष्ट्यशका अपि ॥ ५६ ॥ एषा कषाये द्विक्षीरे विदार्याजरसांशिके । जीवनीयैः पचेत्कल्केैरक्षमात्रैर्घृताढकम् ॥ ५७ ॥ सितापलानि पूतेऽस्मिन् शीते द्वात्रिंशदावपेत् । गोधूमपिप्पलीवाशीचूर्ण शृङ्गाटकस्य च ॥ ५८ ॥ सक्षौद्रं कुडवाशेन तत्सं खजमूर्च्छितम् । स्त्यानं सर्पिर्गुडान् कृत्वा भूर्जपत्रेण वेष्टयेत् ॥ ५९ ॥ ताञ्जग्ध्वा पलिकान् क्षीरं मद्य चानुपिवेत्कफे । शोषे कासे क्षते क्षीणे श्रमस्त्रीभारकर्पिते ॥ ६० ॥ रक्तनिष्ठीवने तापे पीनसे चोरसि स्थिते । शस्ताः पार्श्वशिरःशूले विभेदे स्वरवर्णयोः ॥ ६१ ॥ इति द्वितीयसर्पिर्गुडाः । ( २१ ) सर्पिर्गुड़ ( २ )—क्वाथ के लिये खरैटी, विदारीकन्द, लघुपञ्च मूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, छोटी कटेरी और गोखरू ) पाचो क्षीरी वृक्षो ( बड़, पीपल, पिलखन, गूलर, अश्वत्थ ) के नवीन कोमल पत्ते प्रत्येक एक मुष्टि ( पल ) लेकर आठ गुणे जल मे क्वाथ करे । चतुर्थाश रहने पर उतार ले । कषाय से दुगुना दूध, विदारी का स्वरस तथा बकरे का मास रस प्रत्येक कषाय के समान, अथवा एक एक आढक, कल्कअर्थ-जीवक, ऋषभक आदि जीवनीय गण की दस ओषधिया प्रत्येक एक एक कर्ष, घृत एक आढक ( चार प्रस्थ ) लेकर यथाविधि घृतपाक करे । सिद्ध होने पर छान कर इस घृत मे मिश्री बत्तीस पल, गेहूँ, पिप्पली, वशलोचन, सिंघाड़ा इनमे से प्रत्येक का चूर्ण और शहद प्रत्येक एक एक कुडव ( चार पल ) मिला कर खौचे से भली प्रकार चलावे, जिससे गाढा हो जाये । फिर इनकी एक एक पल की गुटिकाये