भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 616 में से

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पृष्ठ 468

४८४ चरकसंहिता [ अ० ११ बाध कर शक्ति बढाने के लिये भूर्जपत्र ( भोजपत्र ) से लपेट दे । इन गुटि- काओ का एक पल परिमित मात्रा मे खाकर, यदि वायु और पित्त की अविकता हो तो ऊपर से दूध पीवे, कफ की प्रबलता हो तो मद्य का अनुपान करे । ये सर्पिर्गुड़ शोष, क्षत, कास क्षीण, श्रम, भार और स्त्री-प्रसग से कृश हुए व्यक्तियो के लिये, रक्तवमन, पीनस, उरोदाह, पार्श्वशूल, शिर शूल स्वरभेद और विवर्णता मे हितकारी हे ॥ ५६-६१ ॥ त्वक्क्षीरीश्रावणीद्राक्षामूर्वर्षभकजीवकैः । वीरर्द्धिक्षीरकाकोलीबृहतीकपिकच्छुभिः ॥ ६२ ॥ खर्जूरफलमेदाभिः क्षीरपिष्टैः पलोन्मितैः । धात्रीविदारीक्षुरसप्रस्थः प्रस्थं घृतात्पचेत् ॥ ६३ ॥ शर्करार्धतुला शीते क्षौद्रार्धप्रस्थमेव च । क्षिप्व्रा सर्पिर्गुडान्कुर्यात्कासहिक्काज्वरापहान् ॥ ६४ ॥ यक्ष्माणं तमकं श्वासं रक्तपित्त हलीमकम् । शुक्रनिद्राक्षयं तृष्णा हन्युः कार्श्यं सकामलम् ॥ ६५ ॥ इति तृतीयसर्पिर्गुडकाः । सर्पिर्गुड ( ३ )—वंशलोचन, श्रावणी (गोरखमुण्डी), द्राक्षा, मूर्वा, जीवक, ऋषभक, वीरा ( पृश्निपर्णी या शतावरी ), ऋद्धि, क्षीरकाकोली, बड़ी कटेरी, कोंच, खजूर, मेदा प्रत्येक द्रव्य एक एक पल लेकर दूध के साथ खूब बारीक पीस ले । आवले का रस एक प्रस्थ, विदारी का रस एक प्रस्थ, गन्ने का रस एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ लेकर उपराक्त कल्क के साथ घृत सिद्ध करे । घी के शीतल होने पर शर्करा पचास पल, मधु आठ पल मिला कर घृतपिण्ड बना लेवे । ये घृतपिण्ड कास, हिचकी, ज्वर, यक्ष्मा, तमक श्वास, रक्तपित्त, हलीमक, शुक्रक्षय, निद्राक्षय, तृष्णा, कृशता और कामला का नष्ट करते है ॥६२-६५॥ नवमामलकं द्राक्षा १मात्मगुप्ता पुनर्नवाम् । शतावरी विदारी च समागा पिप्पली तथा ॥ ६६ ॥ पृथग्दशपलान् भागान् पलान्यष्टौ च नागरात् । यष्ट्याह्वासौवर्चलयोर्द्विपलं मरिचस्य च ॥ ६७ ॥ क्षीरतैलघृताना च त्र्याढकं शर्कराश्रृते । कथिते तानि चूर्णानि दत्त्वा बिल्वसमान् गुडान् ॥६८॥ कुर्यात्तानभक्षयेत्क्षीणः क्षतशुष्कश्च मानवः । १ 'द्राक्षा नवामामलकी' इति वा पाठः ।

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