चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 469, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८५ तेन सद्यो रसादीना वृद्ध्या पुष्टि स विन्दति ॥ ६६ ॥ इति चतुर्थसर्पिर्गुडकाः। सर्पिर्गुड (४)—नूतन आमले, द्राक्षा, कोच, पुनर्नवा, शतावरी, विदारी- कन्द, मजीठ, पिप्पली प्रत्येक द्रव्य दस पल, साठ आठ पल, मुलहठी, सुवर्चल (सञ्चल नमक) प्रत्येक दो पल, मरिच दो पल इन सब को मिला कर चूर्ण कर ले। फिर दूध, घी और तैल प्रत्येक को एक एक आढक लेकर शर्करा के साथ पकावे। जब गाढा हो जावे तब इसमे आमले आदि सब वस्तुओ का चूर्ण मिला कर विल्व अर्थात् एक एक पल के गुड (गोले) बाध ले। यह गुड क्षीण, उर क्षत तथा कृश रोगी को खाने चाहिये। इससे रसादि की वृद्धि होकर शीघ्र पुष्टि प्राप्त होती है। ॥६६-६६॥ गोक्षीराद्द्वाढकं सर्पिः प्रस्थमिक्षुरसाढकम् । विदार्याः स्वरसात्प्रस्थं रसात्प्रस्थं च तैत्तिरात् ॥ ७० ॥ दद्यात्सिद्ध्यति तस्मिंस्तु पिष्टानिक्षुरसैरिमान् । मधूकपुष्पं कुडवं प्रियालकुडवं तथा ॥ ७१ ॥ कुडवार्थं तुगाक्षीर्या २ खर्जूराणा च विंशतिम् । पृथग्विभीतकानां च पिप्पल्याश्च चतुर्थिकाम् ॥ ७२ ॥ त्रिंशत्पलानि खण्डाच्च मधूकात्कर्षमेव च । तथाऽर्धपलिकान्यत्र जीवनीयानि दापयेत् ॥ ७३ ॥ सिद्धेऽस्मिन्कुडवं क्षौद्रं शीते क्षिप्त्वाऽथ मोदकान् । कारयेन्मरिचाजाजीपलचूर्णावचूर्णितान् ॥ ७४ ॥ वातासृक्पित्तरोगेषु क्षतकासक्षयेषु च । शुष्यतां क्षीणशुक्राणां रक्ते चोरसि संस्थिते ॥ ७५ ॥ कृशदुर्बलवृद्धानां पुष्टिवर्णबलार्थिनाम् । ( १) अष्टागसग्रह मे थोडा पाठभेद है। यथा— 'सशर्कराशृते क्षीरघृततैलाढकत्रये । चूर्णीकृत्य क्षिपेत् पक्वसान्द्रे दशपलाः पृथक् ॥ द्राक्षात्मगुप्ता वषोभूसमगाभीरुपिप्पली । तद्वद् विदार्यामलके प्रस्थार्धं विश्वभेषजम् ॥ ( क ) 'जल्पकल्पतरु' मे 'समगा' के स्थान पर 'समाशा' और 'शर्कराशृते' के स्थान पर 'शर्कराशते' पाठ है । २ 'तुगाक्षीर्यार्धकुडवा खर्जूराणिच विशतिम्' इति । ३ पृथग् बिभीतकानक्षं च पाठः ।