भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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३२ चरकसंहिता [ अ०२

मिलता, तब गर्भ गर्भाशय में सूखने लगता है। अथवा जब स्राव होने लगता है, तब भी गर्भ की वृद्धि नहीं होती, इसलिये वह देर तक गर्भाशय मे रुका रहता है। वह जब कभी बहुत समय के पीछे आहार मे पुष्ट होता है तब स्त्री चिरकाल में स्त्री प्रसव करती है। [वह गर्भ बहुत से वर्षों के बाद बहुत कष्ट से उत्पन्न होता है या माता के जीवन भर उत्पन्न ही नही होता। ऐसा वाग्भट आचार्य का लेख है। जिस समय गर्भ को पुष्ट होने का रस पर्याप्त नही मिलता और इस कारण से प्रसव में देर हो तो ऐसे गर्भ को 'नागोदर' कहते हैं। यदि परिस्राव होने से वर्षों का विलम्ब हो जावे तो उसको 'उपविष्टक' कहते हैं। जब वे बहुत वर्षो के बाद आहार से पुष्ट होकर पैदा होते हैं तब इनके प्रसव काल में गर्भाशय के भीतर ही केश और दात बड़े हो जाते हैं]। उत्पन्न होने वाले जीवों के कर्मों के कारण और न्यून-अधिक रूप में शुक्रार्त्तव के विषम विभाग होने से, जिस समय शुक्रार्त्तव गर्भाशय मे वृद्धि को प्राप्त होता है, तब एक भाग अधिक रहता है और दूसरा भाग न्यून रहता है। इस प्रकार से जोड़े सन्तान में भी यही विशेषता रहता है ॥ १६ ॥ कस्माद् द्विरेताः पवनेन्द्रियो वा सस्कारवाही नरनारिखण्डौ । वक्री तथेष्र्याभिरतिः कथ वा सजायते वातिकषण्डको वा ।' १७॥ प्रश्न--किस कारण से 'द्विरेत' अर्थात् दो वीर्य वाला जीव उत्पन्न होता हे ? किस कारण से पवनेन्द्रिय ( वायु मात्र वीर्य वाला ) उत्पन्न होता है ? किस कारण से सस्कारवाही (जिसको स्त्री वा पुरुष होने का सस्कार मात्र हो) होता है ? किस कारण से नरषण्ड (नपुंसक) और नारी षण्ड होती है ? किस कारण से वक्रध्वज (टेड़े लिंग वाला), ईर्ष्याभिरत (जो दूसरे को देख कर कामार्त्त हो) अथवा वातिक षण्ड (वीर्य के स्थान पर केवल वायु छोड़ने वाला) होता है ? ॥ १७ ॥ बीजात्समाशादुपतप्तबीजात्स्त्रीपुंमलिङ्गी भवति द्विरेताः । शुक्राशयं गर्भगतस्य हत्वा करोति वायुः पवनेन्द्रियत्वम् ॥ १८ ॥ शुक्राशयद्वारविघट्टनेन सस्कारवाह हि करोति वायुः । मन्दाल्पबीजावबलावहर्षौ क्लीबौ च हेतुर्विकृतिद्वयस्य ॥ १६ ॥ मातुर्व्यवायप्रतिघेन वक्री स्याद् बीजदौर्बल्यतया पितुश्च । ईर्ष्याभिभूतावपि मन्दहर्षौवीर्ष्यारतेरेव वदन्ति हेतुम् ॥ २० ॥

  • जिस प्रकार गान्धारी के दो साल गर्भ पेट मे रहा था।