चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] ३ शारीरस्थानम् ३३
वाय्वग्निदोषाद् वृषणौ तु यस्य नाशं गतौ वातिकषण्डकः सः । इत्येवमष्टौ विकृतिप्रकाराः कर्मात्मकानामुपलक्षणीयाः ॥ २१ ॥ जिस समय स्त्री पुरुष के बीज (शुक्र और आर्त्तव) समान भाग हों, अथवा जब बीज किसी दोष के प्रकोप के कारण दुष्ट होता है, तब स्त्री-पुरुषों के लक्षणों वाला 'द्विरेत' (नपुंसक) उत्पन्न होता है । वायु शुक्राशय को नष्ट करके गर्भाशय में स्थित गर्भ को 'पवनेन्द्रिय' वाला बना देता है । वायु शुक्राशय-द्वार को खोलकर संस्कारवाही षण्ड करता है । जिस समय स्त्री प्रथम सन्तुष्ट हो जाती है, तब पीछे पुरुष का उत्सृष्ट शुक्र हर्ष के कारण मन के अस्थिर होने से, स्त्री की वायु को चंचल कर देता है । साथ में पुरुष के शुक्रवाहक स्रोत भी पुष्ट हो जाते हैं, तब वातेन्द्रिय पुरुष उत्पन्न होता है । स्त्री के साथ सम्भोग करने पर शुक्र की भांति वायु ही आता है और जब यह वायु इस पुरुष के शुक्रवाही स्रोतो को नष्ट न करके केवल मुखों को बन्द कर देता है तब संस्कारवाही नपुंसक उत्पन्न होता है । संस्कार से (वाजीकरण, बस्ति, खान पान से) वह प्रवृत्त होता है । मन्द एव अल्प बीज वाले निर्बल एवं अल्प कामेच्छा वाले स्त्री-पुरुष नरषण्ड एव नारीषण्ड की उत्पत्ति मे कारण होते हैं । माता और पिता के मैथुन के प्रतिघात होने से (अनुचित रीति से सम्भोग करने पर) तथा बीज की निर्बलता से वक्रध्वज (टेढ़ी इन्द्रिय वाला) नपुंसक उत्पन्न होता है । ईर्ष्या से युक्त मन्द कामेच्छा वाले स्त्री पुरुष 'ईर्ष्या से रति करने वाले नपुंसक' का कारण है । जिस समय अल्पबल वाला पुरुष अल्प कामेच्छा या द्वेषवाली स्त्री के साथ काम-उद्वेग के कारण सम्भोग करता है, तब नरषण्ड उत्पन्न होता है । वह ईर्ष्या-रति नामक नपुंसक दूसरों को रति करते देख कर रति मे प्रवृत्त होता है, इसलिये इसे 'ईर्ष्याण्ड' कहते हैं । जिस पुरुष के गर्भ में वायु और अग्नि दोष के कारण वृषण नाश हो जाते हैं, उसे 'वातिक षण्ड' कहते है । गर्भ को ये आठ द्विरेत आदि विकृतिया आठ षण्डयोनिया कर्म की विचित्रता से होती है ॥ १८-२१ ॥ गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य कुक्षौ स्त्री-पुं-नपुंसामुदरस्थितानाम् । किं लक्षणं कारणमिष्यते किं सरूपतां यन च यात्यपत्यम् ॥ २२ ॥ प्रश्न—गर्भाशय मे तत्काल गर्भ स्थिर होने क क्या लक्षण है ? उदर में स्थित स्त्री, पुरुष और नपुंसक के क्या लक्षण हैं ? और किस कारण से संतान में माता पिता का समान रूप आता है ? ॥ २२ ॥ निष्ठिवीका गौरवमङ्गसादस्तन्द्राप्रहर्षो हृदयव्यथा च । तृप्तिश्च बीजग्रहणं च योन्यां गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य लिङ्गम् ॥२३॥