चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 471, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८७ (२) अति मैथुन से क्षीण पुरुष विदारी और गन्ने के रस मे पका कर, घी मे भून कर (घी का बघार देकर), अनार या आवले से खट्टा करके मुद्गादि यूष पीवे, यह यूष अतिशय बृं हण (वृष्य) है ॥ ८० ॥ शक्तूनां वस्त्रपूताना मन्थं क्षौद्रघृतान्वितम् । यवान्नसात्म्यो१ दिप्ताग्निः क्षतक्षीणः पिबेन्नरः ॥ ८१ ॥ (३) क्षीण व्यक्ति जिसको जौ अनुकूल हो और जिसकी जाठर अग्नि प्रदीप्त हा वह जौ के सत्तू को पानी मे घोलकर मन्थ बना लेवे । इस मन्थ को कपड़े से छान कर इसमे घी और मधु मिला कर पीवे ॥ ८१ ॥ जीवनीयोपसिद्धं वा घृतभृष्टं तु जाङ्गलम् । रसं प्रयोजयेत् क्षीणे व्यञ्जनार्थे सशर्करम् ॥ ८२ ॥ (४) क्षतक्षीण व्यक्ति के व्यजन के लिये जीवक, ऋषभक आदि जीव- नीय गण की ओषधिया के साथ घी मे भूने जागल पशुओ के मास रस को शर्करा मिला कर देव । [ उसके साथ वे चावल, रोटी आदि खावे ] ॥८२॥ गोमहिषाश्वनागाजः२ क्षीरमांसरसस्तथा । यथाग्नि भोजयेद्युषैः फलाम्लैर्घृतसंस्कृतैः ८३ ॥ (५) बैल, भैस, घोड़ा, हाथी और बकरा इनके मास-रस तथा दूधों के साथ अनार, आवले आदि फलो से खट्टा बना कर घी से सस्कृत कर मुद्गादि यूषो के साथ यवान्न खिलावे ॥ ८३ ॥ दीप्तेऽग्नौ विधिरेषः स्यान्मन्दे दीपनपाचनः । यक्ष्मिणा विहितो ग्राही भिन्ने शकृति चेष्यते ॥ ८४ ॥ क्षतक्षीण व्यक्ति को यदि अग्नि दीप्त हो तो उपराक्त विधि बरते । अग्निमन्द हा ता दीपन पाचन विधि बरते । यदि अतीसार हो तो यक्ष्मा रोग मे वर्णित मलसग्राही विधि का प्रयोग करे । जैसे—॥ ८४ ॥ पलिकं सैन्धवं शुण्ठी द्वे च सावचेलात्पले । कुडवांशानि वृक्षाम्लं दाडिम पत्रमर्जकात् ॥ ८५ ॥ एकैक मरिचाजाज्योर्धान्यकाद् द्वे चतुर्थिके । शर्करायाः पलान्यत्र दश द्वे च प्रदापयेत् ॥ ८६ ॥ कृत्वा चूर्णमतो मात्रामन्नपाने प्रयोजयेत् । रोचनं दीपनं बल्य पार्श्वार्त्तिश्वासकासनुत् ॥ ८७ ॥ इति सैन्धवादिचूर्णम् । १ 'यावन्नसात्म्यो' इति । २ 'गोमहिष्यविनागाजैर्गिति च पाठः ।