चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 478, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ चरकसंहिता [ अ० १२ ग्राम्यानूपं पिशितलवणं १ शुष्कशाकं नवान्नं गौडं पिष्टं दधि तिलकृतं विज्जल मद्यमम्लम् । धाना वल्लूरमशनमथो गुर्वसात्म्यं विदाहि स्वप्नं रात्रौ श्वयथुगदवान् वर्जयेन्मैथुनं च ॥ २० ॥ अपथ्य—शोथ रोगी को चाहिये कि ग्राम्य पशुओ (बकरी, गाय आदि) का मास जलचर प्राणियो ओर अनूप स्थान मे रहने वाले भैस, सूअर आदि का मास, नमक, शुष्क शाक, नूतन अन्न, गुड से बनी वस्तुएँ, पिष्टान्न, दधि, कृशरा (तिल-तण्डुल), पिच्छिल द्रव्य, मद्य, अम्ल, धान (खिले भूने जा ), शुष्क मास, गुरु, असात्म्य भोजन, विदाहकारक खानपान, दिन म सोना और मैथुन इन सब का परित्याग करे ॥ २० ॥ चिकित्सा — व्योषं त्रिवृत्तिक्तकरोहिणी च लायोरजस्का त्रिफलारसेन । पीता कफोत्थं शमयेत्तु शोफं मूत्रेण गव्येन हरीतकी वा ॥ २१ ॥ (१) त्रिकटु (सोठ, मरिच, पिप्पली), निशोथ, कुटकी इनके चूर्ण का लोह-भस्म और त्रिफला क्वाथ के साथ पीवे, अथवा गोमूत्र के साथ हरड लेने से कफजन्य शोथ शान्त होता है ॥ २१ ॥ हरीतकीनागरदेवदारुसुखाम्बुयुक्तं सपुनर्नवं वा । सर्वं पिबेत् त्रिष्वपि मूत्रयुक्तं स्नातश्च जीर्णे पयसाऽन्नमद्यात् ॥ २२ ॥ (२) हरड, सोंठ, देवदारु और पुनर्नवा इनके चूर्ण को गरम पानी से पीवे । यह योग वात आदि तोनो शाथो मे उपयुक्त है । अथवा इन सब चूर्ण को गोमूत्र के साथ पीवे । औषध के जीर्ण होने पर गरम पानी से स्नान करके दूध के साथ अन्न खावे ॥ २२ ॥ पुनर्नवानागरमुस्तकल्कन्प्रन्थेन धीरः पयसोऽक्षमात्रान् । मयूरकं मागधिका समूलां सनागरा वा प्रपिबेत्सवाते ॥ २३ ॥ (३) धीर अर्थात् निवृत्त आम दोष वाला शोथ-रोगी वातजन्य शोथ मे पुनर्नवा, सोठ, मोथा इनके चूर्ण की एक कर्ष मात्रा दूध के साथ लेवे । अथवा मयूरक (अपामार्ग ), मागधिका (पिप्पली), पिप्पलीमूल और सोठ इनके चूर्ण की एक कर्ष-मात्रा को दूध के साथ पीवे ॥ २३ ॥ १ लवण के स्थान पर 'अबलम्' पाठ भी है। वहाँ पर निर्बल प्राणि का मास त्याज्य समझना चाहिये ।