चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 477, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४९३ असाध्य-शोथ—रोगों से कृश हुए, निर्बल व्यक्ति का, वमन, श्वास आदि उपद्रवों से युक्त शोथ और मर्म स्थान का शोथ, जिस शोथ में रेखायें पड गई हों, निर्बल व्यक्ति मे जिस शोथ से स्राव बहता हो और जो शोथ सर्वांग में व्याप्त हो वह असाध्य है । शोथ के उपद्रव—वमन, श्वास, अरुचि, तृष्णा, ज्वर, अतीसार शोथ के ये सात उपद्रव है ॥ १५ ॥ अहीनमांसस्य य एकदोषजो नवोऽबलस्तस्य सुखः स साधने । निदानदोषर्तुविपर्ययक्रमैरूपाचरेन् त बलदोषकालवित् ॥१६॥ साध्य शोथ—जिसका मास हीन न हो, कृश न हो ऐसे बलवान् व्यक्ति का, शरीर के एक भाग मे उत्पन्न, नवीन शोथ ( जो देर का उत्पन्न न हुआ हो ), सुखसाध्य हैं । रोगी और रोग के बल, दोष तथा काल को समझने वाले वैद्य को चाहिये कि वह कारण, दोष, ऋतु (काल) के विपरीत क्रम से चिकित्सा करे॥१६॥ अथामजं लङ्घनपाचनक्रमैर्विशोधनैरुल्बणदोषमादितः । शिरोगतं शीर्षविरेचनैरथोविरेचनैरूर्ध्वहरैस्तथोर्ध्वजम् २ ॥ १७ ॥ उपाचरेत् स्नेहकृतं विरूक्षणः प्रकल्पयेत्स्नेहविधि च रूक्षजे । विबद्धविट्केऽनिलजे निरूहणं घृतं तु पित्तानिलजे सतिक्तकम् ॥ १८ ॥ पयश्च मूर्च्छार्तिदाहतर्षिते विशोधनीये तु समृत्रमिष्यते । कफोत्थितं क्षारकटूष्णसंयुतैः समूत्रतक्रासवयुक्तिभिर्जयेत् ॥ १६ ॥ आमजन्य सर्व शरीर मे व्याप्त शोथ मे यदि दोष अल्प हो तो लङ्घन और पाचन क्रम से चिकित्सा करे । यदि दोषो की प्रबलता हो तो शोधन द्वारा दोषों को निकाल दे । शिरोगत शोथ मे शीर्ष विरेचन, अधोभाग मे स्थित शोथ मे विरेचन, ऊर्ध्व भाग मे स्थित शोथ मे वमन देवे, स्नेहजन्य शोथ मे विरूक्षण क्रिया और रूक्षजन्य शोथ मे स्नेहन क्रिया करे । वातजन्य शोथ मे मलावरोध हो तो निरूहण-बस्ति दे पित्तजन्य और वातजन्य शोथो मे तिक्तक घृत दे । पित्तजन्य शोथ मे यदि मूर्च्छा, बेचैनी, दाह और प्यास हो तो दूध पीवे । यदि रोगी शोधन के योग्य हो तो दूध को मूत्र के साथ देवे । कफजन्य शोथ मे क्षार, कटु, उष्ण वस्तुओ से मिला कर मूत्र, तक्र ( छाछ ) और आसवो का उप- योग करे ॥ १७-१६ ॥ १ उपद्रवो के लिये देखिये ( चरक० सू० अ० १८ ) । २ 'रूध्वमधस्तथोर्ध्वगम्' इति च पाठ ।