भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 476

४९२ चरकसंहिता [ अ० १२ सगौरवं स्यादनवस्थितत्वं सोत्सेधमुष्माऽथ सिरातनुत्वम् । सलोमहर्षाङ्गविवर्णता च सामान्यलिङ्गं श्वयथोः प्रदिष्टम् ॥ ११ ॥ सामान्य लक्षण—अंगों में भारीपन, सूजन, शोथ की चंचलता, अस्थिरता (वायु के कारण), सूजन, उष्णिमा और शिराओं का पतलापन, रोमहर्ष, अंग की विवर्णता ये शोथ के सामान्य लक्षण हैं ॥ ११ ॥ चलस्तनुस्त्वक्परुषोऽरुणोऽनितः प्रसुप्तिहर्षार्तियुतोऽनिमित्ततः । प्रशाम्यति प्रोन्नमति प्रपीडितो दिवा बली च श्वयथुः समीरणान् ॥१२॥ वातिक शोथ—वह शोथ अस्थिर इधर-उधर चलता रहता है, त्वचा पतली हो जाती है, कर्कश, लाल काला वर्ण, प्रसुप्ति (स्पर्श की अज्ञता), हर्ष (चिन्चिन् वेदना या रोमहर्ष), बिना कारण के ही पीड़ा होना (कभी दर्द होना और कभी रुक जाना), दबाने से शोथ शान्त हो जाता है, परन्तु दबाव हटा लेने पर फिर उठ जाता है, शोथ का जोर दिन के समय अधिक रहता है। यह शोथ जल्दी उठता और जल्दी शान्त हो जाता है ॥ १२ ॥ मृदुः सगन्धोऽसितपीतरागवान्भ्रमज्वरस्वेदतृषामदान्वितः । य उच्यते स्पर्शरुग १क्षिरागकृत्सपित्तशोथो भृशदाहपाकवान् ॥१३॥ पैत्तिक शोथ—कोमल, गन्धयुक्त, इसका रंग काला, पीला या लाल होता है। इसके साथ रोगी में भ्रम (चक्कर आना), ज्वर, पसीना, प्यास और मूर्च्छा रहती है। इसमें तीव्र दाह रहता है, छूने मात्र से दर्द होता है, आँखों में भी लाली दौड़ जाती है, इस पित्तजन्य शोथ में अतिशय दाह (जलन) और पाक होता है ॥ १३ ॥ गुरुः स्थिरः पाण्डुररोचकान्वितः प्रसेकनिद्रावमिवह्निमान्द्यकृत् । स कृच्छ्रजन्मप्रशमो निपीडितो न चोन्नमेद्रात्रिबली कफात्मकः ॥१४॥ कफजन्य शोथ—भारी और स्थिर होता है, इस शोथ का रंग भूरा, धूसर रहता है। रोगी को अरोचकता, मुख से लाल स्राव, निद्रा, वमन और अग्नि- मान्द्य होता है। यह सूजन देर में उत्पन्न होता है और देर में ही शान्त होता है। दबाने से दब जाता है और फिर ऊपर नहीं उठता, इसका रात्रि में बल अधिक होता है ॥ १४ ॥ कृशस्य रोगैरबलस्य यो भवेदुपद्रवैर्वा वमिपूर्वकैर्युतः । स हन्ति मर्मा२नुगतोऽथ राजिमान्परिस्रवेद्दीनबलस्य सर्वगः ३ ॥१५॥ १ 'स्पर्शसहो' इति पाठान्तरम् । २ 'महात्तिंममो' इति पाठान्तरम् । ३ 'परिस्रवन् भीमबलश्च सर्वशः' इति च पाठः ॥