चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४९१ बाह्याः सिराः प्राप्य यदा कफासृक्पित्तानि संदूषयतीह वायुः । तैर्बद्धमार्गः स तदा विसर्पन्नुत्सेधलिङ्गं श्वयथुं करोति ॥ ८ ॥ सम्प्राप्ति—उपरोक्त कारणो से कुपित वायु जिस समय इस शरीर मे बाह्य सिराओ मे पहुच कर कफ, रक्त और पित्तको दूषित कर देता है, तब दूषित कफ, रक्त और पित्त से मार्गो के रुक जाने पर वायु इधर-उधर न जाकर, वही पर फैल कर सूजन रूप मे शोथ को उत्पन्न कर देता है ॥ ८ ॥ उरःस्थितैरूर्ध्वमधश्च वायोः स्थानस्थितैर्मध्यगतैश्च मध्ये । सर्वाङ्गगैः सर्वगतैः क्वचित्स्थदोषैः क्वचित्स्याच्छ्वयथुस्तदाख्यः ॥९॥ शोथारम्भक दोष जब श्लेष्मा क स्थान आमाशय मे स्थित होते है, तब शरीर के ऊपर के भाग म शोथ होता है । आर जब वायु का स्थान पक्वाशय मे दोष स्थित होते ह, तब शरीर के निचले भाग मे शोथ होता है । जब पित्त के स्थान मे मध्य भाग मे दोष स्थित होते हैं, तब मध्य मे शोथ होता है । समस्त शरीर मे व्याप्त दोष समस्त शरीर मे शोथ उत्पन्न करते हैं और शरीर के एक देश (कण्ठ, तालु आदि) मे स्थित दोष एक अग मे शोथ करते हैं ॥ ९ ॥ ऊष्मा तथा स्याद्दवथुः सिराणामायाम इत्येव च पूर्वरूपम् । सर्वस्त्रिदोषोऽधिकदोषलिङ्गेस्तत्तत्संज्ञमभ्येति भिषग्जितं च ॥१०॥ पूर्वरूप—अंगों मे उष्णता, दवथु (दाह, उपताप), सिराओं का विस्तार (तनाव), ये शोथ रोग के पूर्वरूप हैं । सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त शोथ सन्निपात- जन्य होता है । उस शोथ मे जो दोष अधिक होता है उसी के नाम से वह कहा जाता है और उसी दोष के अनुसार चिकित्सा होती है । [वात दोष की अधि- कता होने पर वातिक और पित्त और कफ की अधिकता से पैत्तिक और श्लैष्मिक कहा जाता है] ॥ १० ॥ १ सुश्रुत मे कहा है-- “दोषा. श्वयथुमूर्ध्वं हि कुर्वन्त्यामाशयस्थिता । पक्वाशयस्था म ये च वर्च स्थानगतारत्वधः । कृत्स्नदेहमनुप्राप्ता. कुर्यु. सर्वसरं तथा ॥ आमाशयगत दोष ऊपर की ओर शोथ पैदा करते है, पक्वाशयगत दोष मध्य मे और मलस्थान मे स्थित दोष नीचे के अगो मे शोथ उत्पन्न करते हैं । सारे देह मे व्याप्त दोष समस्त देह में शोथ पैदा कर देते हैं ।