भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 616 में से

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पृष्ठ 474

४६० चरकसंहिता [ अ० १२

भिषग्वरिष्ठं सुरसिद्धजुष्टं मुनीन्द्रमत्र्यात्मजमग्निवेशः ।
महागदस्य श्वयथोर्यथावत्प्रकोपरूपप्रशमानपृच्छत् ॥ ३ ॥
वैद्यों मे श्रेष्ठ, देवा और सिद्धजनो से मेवित, अत्रि के पुत्र मुनि श्रेष्ठ
पुनर्वसु से अग्निवेश ने शोथ नामक महारोग के यथावत् प्रकोपके कारण,
लक्षण और चिकित्सा विषयक प्रश्न किया ॥ ३ ॥
तस्मै जगादागदवेदसिन्धुप्रवतनाद्रिप्रवरोऽत्रिजस्तान् ।
वातादिभेदान्त्रिविधस्य सम्यङ् निजानिजेकाङ्गजसर्वजेस्य ॥४॥
अगद ( आरोग्य ) का बतलाने वाले आयुर्वेद रूप महानदी बहाने वाले
श्रेष्ठ पर्वतरूप भगवान् आत्रेय ने अग्निवेश को निज ( शारीरिक ) और आग-
न्तुज, एकाङ्गज तथा सर्वाङ्गज शोथ तथा वातादि भेद से भिन्न तीन प्रकार के
शारीरिक शोथा का उपदेश किया ॥ ४ ॥
शुद्धस्य मियाम्यक्षतदौर्बल्यानां क्षाराम्लतीक्ष्णोष्णगुरुपसेवा ।
दध्याममृच्छाफांश्चावदुष्टगरा सृष्टाहारनिषेवणं च ॥ ५ ॥
अशर्शन्चेष्टा न च दुष्टशुद्धिर्ममोपघातो १ विषमा प्रसूतिः ।
मिथ्योपचारः प्रतिकमणां च निजस्य हेतुः श्वयथाः २ प्रदिष्टः॥६॥
कारण—शोधन ( वमन आदि कर्म ), आमय ( रोगज्वर आदि ), अभक्त
( उपवास ) स कृश हुए और बलसहित पुरुषा का क्षार, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण,
भारी पदार्थो का सेवन, दही, आम ( कच्च फल आदि ), मिट्टी, शाक, विरोधी
और दूषित अन्न ( जैसे-मन्दक दही ) ओर गर अर्थात् विषयुक्त भोजन का
सेवन, अर्श रोग, अचष्टा अर्थात् शारीरिक व्यायाम आदि क्रिया का न करना,
आलस्य मे पडे रहना, शोधन योग्य शरीर का शोधन न करना, गर्भ का निष्पा-
डन, विषम प्रसव ( आम-गर्भपात आदि ) और वमन आदि कार्यों का मिथ्या
आचरण ये सब शरीरजन्य शोथ के कारण है ॥ ५-६ ॥
बाह्यत्वचो दूषयिताऽभिघातः काष्ठाश्मशस्त्राग्न्यशनीविषाद्यैः ।
आगन्तुहेतुः ।
बाह्य त्वचा को दूषित करने वाले, काष्ठ, आग, शल्य ( काटा आदि ), पत्थर,
विष, लोह आदि से अभिघात ( चोट ) लगने से उत्पन्न शोथ आगन्तुज होते है ।
त्रिविधो निजश्च सर्वाधं गात्रावयवाश्रितवान् ॥ ७॥
निज शोथके भेदः—निज शोथ तीन प्रकार का होता है । ( १ ) सम्पूर्ण
शरीर मे व्याप्त,( २ ) आधे शरीर मे व्याप्त और ( ३ ) एक अवयव मे व्याप्त ॥७॥
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१ 'मर्मोपघातो' इति च पाठः । वहा पर मर्मस्थान पर चोट लगना अर्थ
करना चाहिये । २ 'श्वयथौ' इति च पाठः ।
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