भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 473

अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४८६ यद्यत्सन्तर्पणं शीतमविदाहि हितं लघु । अन्नपानं निषेव्यं तत्क्षतक्षीणैः सुखार्थिभिः ॥ ९३ ॥ यच्चोक्तं यक्ष्मिणां पथ्यं कासिनां रक्तपित्तिनाम् । तच्च कुर्यादवेक्ष्याग्निं व्याधिं सात्म्यबलं तथा ॥ ९४ ॥ जो जो अन्न सन्तर्पण करने वाला, शीत परन्तु विदाही नही, हितकारी लघु हे वह सब सुखार्थी क्षतक्षीण रोगियों को सेवन करना चाहिये । राजयक्ष्मा के रोगी, कास-रोगी और रक्तपित्त रोगी के लिये जो पथ्य कहा है, वह सब क्षतक्षीण-रोगी के लिये अग्निबल, रोगबल ओर सात्म्य तथा शरीर का बल देख कर प्रयोग करना चाहिये ॥९३-९४॥ उपेक्षिते¹ भवेत्तस्मिन्ननुबन्धो हि यक्ष्मणः । प्रागेवाऽऽगमनात्तस्य तस्मात् त्वरया जयेत् ॥ ९५ ॥ क्षतक्षय रोग की उपेक्षा करने से यह यक्ष्मा-रोग का कारण हो जाता है । इसलिये यक्ष्मा रोग के होने से पूर्व ही क्षतक्षीण रोग की चिकित्सा शीघ्र करनी चाहिये ॥ ९५ ॥ तत्र श्लोकौ—क्षतक्षयसमुत्थानं सामान्यपृथगाकृतिम् । असाध्ययाप्यसाध्यत्वं साध्यानां सिद्धिमेव च ॥ ९६ ॥ उक्तवान् ज्येष्ठशिष्याय क्षतक्षीणचिकित्सिते । तत्त्वार्थविद्धीतरजस्तमोमोहः² पुनर्वसुः ॥ ९७ ॥ उपसहार—क्षतक्षीण रोग का कारण, सामान्य लक्षण, विशेष लक्षण, साध्य, याप्य, असाध्य, साध्य रोग की चिकित्सा ये सब विषय क्षतक्षीण चिकित्सा मे तत्त्वज्ञानी, रज, तम और मोह से रहित भगवान् आत्रेय ने अपने ज्येष्ठ शिष्य अग्निवेश को उपदेश किया ॥९६-९७॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने क्षतक्षीणचिकित्सितं नामैकादशोऽध्याय ॥ ११ ॥ —-o-o-— द्वादशोऽध्यायः अथातः श्वयथुचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे श्वयथु ( शोथ ) रोग की चिकित्सा की व्याख्या करते है, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ १. ‘उपेक्षितो’ इति । २ ‘तमोदोषः’ इति च पाठः ।