भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 482

४६८ चरकसंहिता [ अ० १२

मासं निदध्याद् घृतभाजनस्थं यवेषु तानेव निहन्ति रोगान् ॥३६॥
इति फलत्रिकाद्यरिष्टः ।
( १२ ) त्रिफलाद्यरिष्ट—त्रिफला दीप्यक ( अजवायन ), चीता, पिप्पली,
लोह भस्म, वायविडग प्रत्येक द्रव्य १ कुडव (चार पल), मधु ८ पल, पुराना
गुड १०० पल, पानी एक द्रोण इन सब को घी से भावित घड मे डालकर एक
मास तक जौ की राशि मे रख दे । इन अरिष्ट के बन जाने पर इसको पीवे ।
[ जीर्ण होने पर पूर्ववत् मास-रस के साथ अन्न भोजन करे ] । यह अरिष्ट भी
उपरोक्त रोगो को नष्ट करता है ॥३६॥
ये चार्शसा पाण्डुविकारिणा च प्रोक्ताः शुभाः शोफिषु तेऽप्यरिष्टाः ।
कृष्णा सपाठा गजपिप्पली च निदिग्धिका चित्रकनागरे च ॥ ४० ॥
सपिप्पलीमूलरजन्यजाजी मुस्तं च चूर्णं सुखतोयपीतम् ।
( १३ ) जो अरिष्ट अर्शरोग और पाण्डुरोग मे कहे हैं, वे सब शोफ रोगियो
के लिये भी हितकारी है । पिप्पली, पाठा, गजपिप्पली, छोटी कटेरी, चीता,
सोठ, पिप्पलीमूल, हल्दी, अजाजी ( जीरा ), मोथा इन सब का चूर्ण करके
गरम पानी के साथ पीने से त्रिदोषजन्य और पुरातन शोफ नष्ट होता है ॥४०-॥
हन्यात् त्रिदोष चिरज च शोफं कल्कश्च भूनिम्बमहोौषधस्य ॥४१॥
अयोरजस्त्र्यूषणयावशूक चूर्णं च पीतं त्रिफलारसेन ।
( १४ ) इसी प्रकार चिरायता, सोठ इनका चूर्ण भी गरम पानी के साथ
पीने से पुरातन श.फ को नष्ट करता है । लोह भस्म, सोठ, मरिच, पिप्पली,
यवक्षार इनका चूर्ण त्रिफला क्वाथ के साथ पीने से त्रिदोषजन्य और पुरातन
शोथ नष्ट होता है ॥ ४१- ॥
क्षारद्वयं स्याल्लवणानि चत्वार्ययोरजो व्योषफलत्रिकं च ॥ ४२ ॥
सपिप्पलीमूलविडङ्गसार मुस्ताजमोदामरदारुबिल्वम् ।
कलिङ्गकाश्चित्रकमूलपाठ सयष्टिकं चातिविषं पलाशम् ॥ ४३ ॥
सहिङ्गु कर्षं तु सुसूक्ष्मचूर्णं द्रोणं तथा मूलकशुण्ठकानाम् ।
स्याद्भस्मनस्तत् सलिलेन साध्यमालोड्य यावद् घनम्प्रदग्धम् ॥४४॥
स्त्यानं ततः कोलसमां तु मात्रां कृत्वा सुशुष्कां विधिनोपयुञ्ज्यात् ।
प्लीहोदरश्वित्रहलीमकार्शःपाण्ड्वामयारोचकशोषशोफान् ।
विसूचिकागुल्मगरारमरीश्च सश्वासकासाः प्रणोदेत् सकुष्ठाः ॥४५॥
इति क्षारगुडिका ।
( १५ ) क्षार गुडिका—दो क्षार ( सज्जीखार और जौखार ), चारों नमक