भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४६६ ( सैन्धव, सचल, विड् और उद्भिद ), मोठ, मरिच, पिप्पली, हरड, बहेडा, आवला, पिप्पली मूल, वायविडग, तण्डुल, मोथा, अजवायन , देवदारु, बेलगिरी, इन्द्रजौ, चीतामूल, पाठा, मुलहठी, अतीस ये प्रत्येक एक-एक पल, हीग एक कर्ष इन सब का सूक्ष्म चूर्ण करले। शुष्क मूली और सोठ को जलाकर इनकी भस्म एक द्रोण लेकर चार द्रोण पानी मे घाल दे । फिर इसका वस्त्र मे छान कर इनमे उपरोक्त चूर्ण मिलाकर पकावे । जब गाढा हो जाये तब इसकी बेर के बराबर ( दो शाण = ६ मापा ) मात्रा बना ले। शुष्क होने पर प्रतिदिन मास रस के साथ अन्न को खाते हुए इसका उपयोग करे । इसके उपयोग से प्लीहारोग, उदररोग, श्वित्र, हलीमक, अर्ग, पाण्डुरोग, अरोचक, शोष, शोफ, विसूचिका, गुल्म, गर ( विष ), अश्मरी, श्वास, कास और कुष्ठ-रोग नष्ट हो जाते है ।१ ४२-४५॥ प्रयोजयेदार्द्रकनागर वा तुल्य गुडेनार्धपलाभिवृद्ध्या । मात्रा परं पञ्चपलानि मासं जीर्णे पयो यूषरसान्नमभोक्ता ॥ ४६ ॥ गुल्मोदराःश्वयथुप्रमेहान् श्वासप्रतिश्यालसकाविपाकान् । सकामलान् शोपमनोविकारान् कासं कफं चैव जयेत्प्रयोगः ॥४७॥ इति गुडार्द्रकप्रयोगः । ( १६ ) गुडार्द्रक प्रयोग-आर्द्रक ( अदरक ) और गुड को समान मात्रा मे मिला कर आधे पल की मात्रा से आरम्भ करे । प्रतिदिन आधा पल बढाते हुए उत्कृष्ट मात्रा पाच पल तक लेजा कर इसको एक मास तक बरते। मात्रा के जीर्ण होने पर दूध, मूग, यूष और मास रस के साथ अन्न खावे। इसके प्रयोग से गुल्म, उदर, अर्श, शोथ, प्रमेह, श्वास, प्रतिश्याय, अलसक, अविपाक, कामला, शोष, मानसिक-रोग और कफजन्य कास-रोग नष्ट होता है ॥४६-४७॥ रसस्तथैवार्द्रकनागरस्य पयोऽथ जीर्णे पयसाऽन्नमद्यात् । शिलाह्वयं १ च त्रिफलारसेन हन्यात् त्रिदोषं श्वयथुं प्रसह्य ॥४८॥ इति शिलाजतुप्रयोगः । ( १७ ) शिलाजतु प्रयोग-आर्द्रक के रस मे समान भाग गुड मिलाकर पीवे । इसके जीर्ण होने पर दूध के साथ चावल खावे । त्रिफला काथ के साथ शिलाजीत सेवन करने से त्रिदोषजन्य शोथ नष्ट होता है ॥ ४८ ॥ द्विपञ्चमूल्यास्तु पचेत्कषाये कंसोऽभयाना च शतं गुडस्य । लेहे सुसिद्धे च विनीय चूर्णं व्योषं त्रिसौगन्ध्यमुषा स्थिते च ॥४६॥ १. 'जत्वश्मज' इति च ।