भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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५१० चरकसंहिता [अ० १२ अन्त्रोऽनिलाद्यैर्वृषणे स्वलिङ्गैस्तन्त्रं निरेति प्रविशेन्मुहुश्च । मूत्रेण पूर्णं मृदु मेदसा तु स्निग्धं च विद्यात्कठिनं च शोथम् ॥६१॥ (११) वृद्धिरोग—वृद्धिरोग सात प्रकार का है । जैसे—वातजन्य, पित्त- जन्य, कफजन्य, रक्तजन्य, मूत्रजन्य, मेदोजन्य और आमजन्य । इनमे दोष- जन्य वृद्धि मे दानो के अपने-अपने लक्ष होते हैं १ । अत्रवृद्धि मे आंत वृषणो मे उतर आती हे आर दबाने उ फिर चढ जाती है। मूत्रजन्य वृद्धि मे कोम- लता रहता है। मेदजन्यवृद्धि मे वृषण ( अण्डकोश ) का शोथ स्निग्ध और कठिन रहता है ॥ ६१ ॥ विरेचनाभ्यङ्गनिरूहलेपाः पक्वेषु चैव व्रणवच्चिकित्सा । स्यान्मूत्रसेकः कफजं विपाट्य विशोध्य सीव्यं व्रणवच्च पक्वम् ॥६२॥ वृद्धिजन्य शोथ में यदि आमावस्था (कच्चाई ) हो ता पित्तजन्य वृद्धि में विरेचन, वातजन्य मे अभ्यग, निरूह, लेप करना चाहिये और पकने पर व्रण के समान चिकित्सा करनी चाहिये । मूत्रजन्य, मदजन्य और कफजन्य वृद्धि की आमावस्था मे शस्त्र से चोर कर, दोपो का स्रावन कर पुन. सी देना चाहिये । पकने पर व्रण के समान चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ६२ ॥ क्रिमेस्तृणादिः क्षपणन्ववायप्रवाहणाल्युत्कटकाश्वपृष्ठैः । गुदस्य पार्श्वे पिडका भृशार्त्तिः पक्वप्रभिन्ना तु भगन्दरः स्यात् ॥६३॥ (१२) भगन्दर—कृमि ( चिउटी ) आदि के काटने से, तृणादि के क्षण (खरेचने ) से, गुदा-मैथुन से, वेगपूर्वक प्रवाहन (कुन्थन ) से, उत्कट आसन से, घोडे की पीठ पर बैठने से गुदा के एक दो अगुल की दूरी पर जा अति वेदनायुक्त पिडका उत्पन्न होती है और जिसके पकने पर स्राव बहता है, उसको 'भगन्दर' कहते हैं४ । १ दाषानुसार लक्षण— वातपूर्णो दृतिस्पशो राजा वातादिहेतुरुक् । पक्कोडुम्बरसकाशः पित्ताद्दाहोष्मपाकवान् ॥ कफाच्छीतो गुरुः स्निग्धः कण्डूमान् कठिनोऽल्परुक् । सुश्रुत में अत्रवृद्धि का असाध्य बतलाया है । २ 'क्रिम्यस्थिसूक्ष्म' इति । ३ 'प्रवाहनान्यु' इति च पाठः । ४ 'अपक्वा पिडकापक्कास्तु भगदराः । भग दारयतीति भगन्दरः । ते तु भगगुदबस्तिप्रदेशदारणात् भगन्दरा उच्यन्ते' । सुश्रुत मे पाच प्रकार के 'भगन्दर' कहे है । अष्टाग-सग्रह मे द्वन्द्वज अधिक मानकर आठ प्रकार के भगन्दर माने गये हैं।