चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५११ विरेचन चैषणपाटनं च विशुद्धमार्गस्य च तैलदाहः । स्यात्क्षारसूत्रेण सुपाचितस्य भिन्नस्य चास्य व्रणवच्चिकित्सा ॥६४॥ चिकित्सा—विरेचन, ऐषणी से मार्ग पता लगा करके शस्त्र-द्वारा विपाटन कर मार्ग शोधन करना चाहिये, फिर गरम तैल से दाह ( सेक ) करना चाहिये । अथवा क्षारसूत्र द्वारा भली प्रकार विदीर्ण करके व्रण की भांति इसकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ६४ ॥ जङ्घासु पिण्डीप्रपदोपरिष्टात्स्यात् श्लीपदं मासकफास्रदोषान् । शिराकफघ्नश्च विधिः समग्रस्तत्रेष्यते सर्षपलेपनं च ॥ ६५ ॥ ( १३ ) श्लीपद—जघा और पिण्डलियो मे आश्रित्य मास और रक्त मे स्थित तीव्र कफ दोष, पाव से आकर श्लीपद नामक शोथ को उत्पन्न करता हे । यह शोथ मास रक्त और कफजन्य है१। इसके लिये शिरामोक्षण और कफनाशक सम्पूर्ण विधि बरतनी चाहिये और सरसो का लेप करना चाहिये ॥ ६५ ॥ मन्दास्तु पित्तप्रबलाः प्रदुष्टा२ दोषाः सुतीव्रं तनुरक्तपाकम् । कुर्वन्ति शोथ ज्वरतर्षयुक्तं विसर्पिणं जालगर्दभाख्यम् ॥ ६६ ॥ ( १४ ) जालगर्दभ—अपने कारणो से कुपित वातादि दोष, पित्तोल्बण और मन्द वात कफ की अवस्था मे अति दाहकारक, अल्प, लालरग के शोथ को उत्पन्न करते हे, यह शोथ थोडा पकता है । इसके कारण रोगी को ज्वर और प्यास रहता है, यह शोथ विसर्प के समान फैलता है इसको 'जालगर्दभ' कहते है॥६६॥ विलंघनं३ रक्तविमोक्षणं च विरूक्षणं कायविशोधनं४ च । धात्रीप्रयोगाञ्छिशिरान् प्रदेहान् कुर्यात्सदा जालगर्दभस्य ॥६७॥ चिकित्सा—वैद्य को चाहिये कि जालगर्दभ-रोग मे लघन, रक्तमोक्षण, रूक्ष- क्रिया, वमन-विरेचन, तथा आवले का स्वरस, कल्कादि रूप मे प्रयोग करे, तथा शीतवीर्य द्रव्यो को बारीक पीसकर उनका लेप करे ॥ ६७ ॥ एवंविधाश्चाप्यपरान् परीक्ष्य५ शोथप्रकाराननिलादिलिङ्गैः । शान्ति नयेद्दोषहरैर्यथास्वमालेपनच्छेदनभेददाहैः ॥ ६८ ॥ उपसहार—इसी प्रकार यहा पर न कहे शोथ के अन्य भेदों की वायु आदि १ कुपितास्तु दोषा वातपित्तश्लेष्माणोऽध प्रपन्नवङ्क्षणोरुजानुजङ्घास्ववतिष्ठ- माना० कालान्तरेण पादमाश्रित्य शनै शोफभ्रम जनयन्ति । तत् श्लीपदमाचक्षते सु० नि० १२ ॥ २ 'प्रदिष्टा' इति । ३ 'विलेपन' इति वा पाठः । ४. 'कायविरेचन च' इति वा पाठः । ५. 'निशम्य' इति वा पाठः ।