भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 496, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 496

५१२ चरकसंहिता [अ० १३ दोषो के लक्षणो से पहिचान करके दोषनाशक वमनादि कार्यो द्वारा तथा आलेपन (आपधियो के लेप), छेदन (शस्त्र-द्वारा), भेदन (पकने पर चीरना ), और दाह-कर्म (अग्नि और क्षार से जलाना) से चिकित्सा करनी चाहिये ॥६८॥ प्रायोऽभिघातादनिलः सरक्तः शोथ सराग प्रकरोति तत्र । विसर्पनुन्मारुतरक्तनुच्च कार्य विषघ्नं विषजे च कर्म ॥ ६६ ॥ आगन्तुज शाथ—प्रायः अभिघात के कारण कुपित वायु रक्त के साथ मिलकर लाल वर्ण का गाथ उत्पन्न करती है । इसके लिये विसर्पनाशक तथा वातरक्तनाशक चिकित्सा करनी चाहिये । विषयुक्त प्राणियो के परिसर्पण, नख, मूत्रादि से जा शाथ उत्पन्न हो, उसमे विषनाशक कार्य करना चाहिये ॥६६॥ भवति चात्र—त्रिविधस्य दोषभेदात्सर्वार्धावयवगात्रभेदाच्च । श्वयथोर्द्विविधस्य तथा लिङ्गानि चिकित्सितं चोक्तम् ॥१००॥ उपसहार—वातादि दाष भेद से, सम्पूर्ण आधे और एकदेशीय भेद से तीन प्रकार के तथा शालूक आदि भेद के कारण नाना प्रकार के शोथ के लक्षण, चिकित्सा को इस 'श्वयथु चिकित्सित' अव्याय मे भगवान् आत्रेय ने कह दिया है ॥ १०० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने श्वयथुचिकित्सित नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ त्रयोदशोऽध्यायः। अथात उदरचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे उदर-चिकित्सा रोग की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ सिद्धविद्याधराकीर्णे कैलासे नन्दनोपमे । तप्यमानं तपस्तीव्रं साक्षाद्धर्ममिव स्थितम् ॥ ३ ॥ आयुर्वेदविदां श्रेष्ठं भिषग्विद्याप्रवर्तकम् । पुनर्वसुं जितात्मानमग्निवेशोऽब्रवीद्वचः ॥ ४ ॥ सिद्ध और विद्याधर (देवयोनि) गण से व्याप्त, नन्दन वन के समान कैलास पर्वत पर कठोर तप करते हुए, साक्षात् धर्म के समान स्थित, आयुर्वेद को जानने वालों मे श्रेष्ठ, मर्त्यलोक मे भिषग्-विद्या के प्रवर्त्तक, जितात्मा भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने निवेदन किया ॥ ३-४ ॥