भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५१५ उत्पन्न करता है, रोगी को जीर्ण ( पचा ) या अजीर्ण ( अनपचा ) का ज्ञान नहीं होता । अति तृप्तिपूर्वक खाये अन्न को सहन नही करता, पाव पर थोड़ी सूजन हो जाती है । निरन्तर बल का ह्रास होता रहता है, थोडी सी भी मेहनत से श्वास चढ जाता है । मल बढ जाता है और सञ्चित हो जाता है । बस्ति- सन्धि मे उदावर्त्त के कारण वेदना, पेट मे आध्मान ( अफारा ), थोडे से भी भाजन से पेट ऊपर को बढता है, तन जाता है, फटता हुआ प्रतीत होता है, पेट पर नाड़ियो की रेखाये उत्पन्न हो जाती है और पेट की वलिया का नाश हा जाता है, ये उदर रोग के पूर्वरूप है १ ॥१६-१६॥ रुद्ध्वा स्वेदाम्बुवाहीनि दोषाः स्रोतांसि संचिताः । प्राणाग्न्यपानान् २ संदूष्य जनयन्त्युदरं नृणाम् ॥ २० ॥ सचित दोष प्राण वायु अग्नि और अपान वायु को दूषित करके स्वेद और अम्बु ( लसीका ) का ले जाने वाले ( त्वचा और मास के मध्य मे आश्रित ) स्रोतो को रोक कर उदर-राग उत्पन्न करते है ॥२०॥ कुक्षेराध्मानमाटोपः शोफः पादकरस्य च । मन्दोऽग्निः श्लक्ष्णगण्डत्वं कार्श्य चोदरलक्षणम् ॥ २१ ॥ रूप—पेट मे अफारा और गुडगुडाहट, हाथ और पाव पर सूजन, अग्नि का मन्द होना, गालो पर चिकनापन ( तेल के से पदार्थ का चमकना ), शरीर मे कृशता य उदर राग के लक्षण है ॥२१॥ पृथग्दोषैः समस्तैश्च प्लीहबद्धक्षतोदकैः । संभवन्त्युदराण्यष्टौ तेषां लिङ्गं पृथक् शृणु ॥ २२ ॥ उदर रोग आठ प्रकार का होता है । पृथक् पृथक् दोषों से तीन प्रकार का (१) वातिक, (२) पैत्तिक, (३) श्लैष्मिक, (४) सन्निपातजन्य, (५) प्लीहोदर, (६) बद्धोदर, (७) क्षतोदर और (८) उदकादर । [ इनमे से क्षतोदर को हो अन्य ग्रन्थों मे 'परिस्रावी उदर' कहा है ] अब इनके पृथक् लक्षण सुनो ॥२२॥ रूक्षाल्पभोजनायासवेगोदावर्त्तकर्शनैः । वायुः प्रकुपितः कुक्षिहृद्व स्तिगुदमार्गगः ॥ २३ ॥ हत्वाऽग्नि कफमुद्धूय तेन रुद्धगतिस्तथा । आचिनोत्युदर जन्तोस्त्वङ्मांसान्तरमाश्रितः ॥ २४ ॥ १ पूर्वरूप—बलवर्णाकाङ्क्षा बलीविनाशो जठरे च राज्यः । जीर्णापरिज्ञानविदाहवत्यो बस्तौ रुज पादगतश्च शोफ. ॥ सु० नि० ७ ॥ २ 'प्राणापानान् हि' इति पाठान्तरम् ।