भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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५१६ चरकसंहिता [अ० १३ वातादर के कारण—रूक्ष, अल्प (हीन मात्रा) मे भोजन करने से, परि- श्रम से, उपस्थित वेगो का रोकने से, उदावर्त्त से, मुसाफिरी, भार आदि द्वारा कृशता से, वायु कुपित होकर कुक्षि, हृदय बस्ति और गुदा के मार्ग मे पहुँच कर अग्नि का नाश करके और कफ को उसके स्थान (आमाशय) से लेकर, कफ के कारण माग के रुक जाने से, त्वचा और मास के मध्य मे आश्रित होकर प्राणियो मे उदर रोग वा उत्पन्न करती है ॥ २३-२४ ॥ तस्य रूपाणि—कुक्षि-पाणि-पाद-वृषण-श्वयथूदर-विपाटनमनियतौ च वृद्धिह्रासौ कुक्षि-पार्श्व-शूलोदावर्त्ताङ्गमर्द-पर्वभेद-शुष्क-कास-कार्श्य-दौ- र्बल्यारोचकाविपाका अधोगुरुत्वं वातवचामूत्रसङ्गः श्यावारुणत्वं च नख-नयन-वदन-त्वङ्-मूत्र-वर्चसामपि चोदरं तन्वसित-राजीसिरा- सन्ततमाहतमाध्मातद्दतिशब्दवद्भवति, वायुश्चोर्ध्वमधस्तिर्यक् च सशू- लशब्दश्चरत्येतद्वातोदरं विद्यात्॥ २५ ॥ वातोदर के लक्षण—कुक्षि (कोख) पाव और अण्डकोशो मे शाथ होना, उदर फटता प्रतीत होना, बिना कारण के ही उदर का बढना और घटना, कुक्षि मे शूल, पार्श्वशूल, उदावर्त्त, अगो मे वेदना, पर्व-सन्धियो का टूटना, सूखी खासी, शरीर मे कृशता, निबलता, भोजन मे अरुचि, अविपाक, उदर के निचले भाग पेडू मे भारीपन, वायु, मल और मूत्र का अवरोध, नख, आख, मुख, त्वचा, मल और मूत्र का श्याव (काला) या अरुण (लाल) रग होना, पेट पर पतली काली रेखाये और सिराये दीखना, टकोरने पर वायु से भरे, मशक के समान शब्द होना, पेट मे जब वायु ऊपर, नीचे या तिरछी चले तो दर्द और शब्द होना, ये वातोदर के लक्षण हे ॥ २५ ॥ कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णाग्न्यातपसेवनैः। विदाह्यध्यशनाजीर्णैश्चाशु पित्तं समाचितम् ॥ २६ ॥ प्राप्यानिलकफौ रुद्ध्वा मार्गोन्मार्गमास्थितम् । निहन्त्यामाशये वह्निं जनयत्युदरं ततः ॥ २७ ॥ पित्तोदर के कारण—कटु, अम्ल, लवण, अति उष्ण, अति तीक्ष्ण पदार्थों के सेवन से, अग्नि और धूप के सेवन से, विदाहकारक भोजनो से, अजीर्ण से तथा अध्यशन से (भोजन के ऊपर भोजन करने से) पित्त शीघ्र सचित हो जाता है। यह सचित पित्त वायु और कफ को साथ मे लेकर इनके द्वारा मार्ग को रोक कर, उन्मार्ग में गमन करके आमाशय मे अग्नि का नाश करता है, इससे उदर रोग उत्पन्न होते हैं ॥ २६-२७ ॥ तस्य रूपाणि—दाह-ज्वर-तृष्णा-मूर्च्छातीसार-भ्रमाः कटुकास्यत्वं