भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 504

५२० चरकसंहिता [ अ० १३ मिलने के कारण अग्नि का नाश कर देता है, इससे उदर रोग उत्पन्न होता है१ ॥ ३६-४०॥ तस्य रूपाणि-तृष्णा-दाह-ज्वर-मुख-तालु-शोषोरुसाद-कास-श्वास-दौर्ब- ल्‍‍यारोचकाविपाक-वर्चो-मूत्र-सङ्गाध्मान-च्छर्दि-क्षवथु-शिरो-हृन्नाभिगुद- शूलान्यपि चोदरं मूढवातं स्थिरमरुण-नील-राजि-सिरावनद्धमराजिकं वा प्रायो नाभ्युपरि गोपुच्छवदभिनिर्वर्तत इत्येतद् बद्धगुदोदरं विद्यात् ॥४१॥ बद्धगुदोदर के लक्षण—तृष्णा, जलन, ज्वर, मुख और तालु मे शुष्कता, जंघाओ मे पीड़ा, कास, श्वास, दुर्बलता, भोजन मे अरुचि, अविपाक, मल और मूत्र का अवरोध आध्मान, वमन, छींक का आना, शिरःशूल, हृदयशूल, नाभिशूल, और गुदा मे वेदना रहती है। पेट मे वायु मूर्च्छित रहता है, बाहर नही निकलता । पेट कठोर ( कड़ा ), लाल रग का, नीली रेखाओं और सिराओं से ढका होता है। अथवा उस पर राजि (रेखाये ) बिलकुल नही होती । यह प्राय. नाभि से ऊपर गोपुच्छाकार होता है इसको 'बद्धगुदादर' जाने ॥ ४१ ॥ शर्करातृणकाष्ठास्थिकण्टकैरन्नसंयुतैः । भिद्येतान्त्रं यदा भुक्तैर्जृम्भयाऽत्यशनेन वा ॥ ४२ ॥ इयात्पाकं रसस्तेभ्यश्छिद्रेभ्यः प्रस्रवेद्बहिः । पूरयन् गुदमन्त्रं च जनयत्युदरं ततः ॥ ४३ ॥ छिद्रोदर—शर्करा ( बालुका ), तिनके, काष्ठ, अस्थि और काटे इनको अन्न के साथ खाने से, जृम्भा ( जभाई ) से अथवा अति भोजन से भीतर आतें चिर जाती है और अन्दर-अन्दर पक जाती है। इन पकी आतों से जो रस बाहर निकलता है, वह गुदा, आत्र और उदर मे एकत्र होकर उदर रोग को उत्पन्न कर देता है ॥ ४२-४३ ॥ तस्य रूपाणि—तदधो नाभ्याः प्रायोऽभिनिर्वर्तमानमुदकोदरस्य च यथाबलं च दोषाणा रूपाणि दर्शयत्यपि चाऽऽतुरः स लोहित-नील-पीत- १ सुश्रुत मे—'यस्यान्त्रमन्नमुपलेपिभिर्वा बालाश्मभिर्वा सहितैः पृथग् वा । सचीयते तत्र मल. स दोष क्रमेण नाड्यामिव सकरो हि ॥ निरुध्यते तस्य गुदे पुरीषं निरेचि कृच्छ्रादपि चाल्पमल्पम् । हृन्नाभिमध्ये परिवृद्धिमेति यच्चोदर विट्समगन्धिक च । प्रच्छर्दयन् बद्धगुदो विभाव्यः॥ सु० नि० ७ ॥