भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पिच्छिल-कुणप-गन्ध्यामवर्च उपवेशते । हिक्का-श्वास-कास-तृष्णा-प्रमेहारो- चकाविपाक-दौर्बल्य-परीतश्च भवति । एतच्छिद्रोदरं विद्यात् ॥ ४४ ॥ छिद्रोदर के लक्षण—यह छिद्रोदर प्राय नाभि के नीचे बढ कर शीघ्र ही जलोदर के लक्षणों को प्रकट करता है। छिद्रोदर में दोषो के अनुसार ही लक्षण होते हैं । रोगी का मल लाल, नीला, पीला, पिच्छिल, मुर्दे की गन्ध के समान कच्चा होता है । रोगी को हिचकी, श्वास, कास, प्यास, प्रमेह, अरुचि, अविपाक और दुर्बलता रहती है इसको 'छिद्रोदर' जाने ॥ ४४ ॥ स्नेहपीतस्य मन्दाग्नेः क्षीणस्यातिकृशस्य वा । अत्यम्बुपानान्नष्टेऽग्नौ मारुतः क्लोम्नि संस्थितः ॥ ४५ ॥ स्रोतःसु रुद्धमार्गेषु कफश्चोदकमूच्छितः । वर्धयेता तदेवाम्बु स्वस्थानादुदराय तौ ॥ ४६ ॥ उदकोदर—मन्दाग्नि वाला व्यक्ति स्नेहपान करले वा क्षीण और अति कृश व्यक्ति की अग्नि बहुत अधिक पानी पीने से नष्ट हो जाये तो स्रोतो के मार्गो के बन्द हो जाने पर, कफ और जल से मिश्रित क्लोम मे स्थित वायु वहीं पर पानी को बढा कर अपने स्वाभाविक स्थान से उदर मे लाकर उदर-रोग को उत्पन्न करते है ॥ ४५-४६ ॥ तस्य रूपाणि—अनन्नकाङ्क्षा-पिपासा-गुदस्राव-शूल-श्वास-कास- दौर्बल्यान्यपि चोदरं नानावर्णराजिसिरासन्ततमुदकपूर्णहृतिक्षोभसंस्पर्शं भवति, एतदुदकोदरं विद्यात् ॥ ४७ ॥ दकोदर के लक्षण--भोजन की इच्छा न होना, प्यास, गुदा से स्राव बहना, शूल, श्वास, कास और निर्बलता रहती है। उदर पर नाना प्रकार की रेखाये दिखाई देती है । पानी से भरी मशक के समान उदर का स्पर्श होता है । [ एक तरफ टकोरने से तरग दूसरे पार्श्व मे आती है ] इसको 'दकोदर' जाने ॥ ४७ ॥ तत्र, अचिरोत्पन्नमनुपद्रवमनुदकमुदर त्वरमाणश्चिकित्सेत् । उपे- क्षितानाह्येषा दोषाः स्वस्थानादपावृत्ता अपरिपाकाद् द्रवीभूताः सन्धीन् स्रोतांसि चोपक्लेदयन्ति, स्वेदश्च बाह्येषु स्रोतःसु प्रतिहतगतिस्तिर्यगव- तिष्ठमानस्तदेवोदकमाप्याययति ॥ ४८ ॥ दकोदर के उत्पन्न होने के साथ ही, छर्दि (वमन) अतिसार आदि उप- द्रव उत्पन्न होने और जल भरने से पूर्व ही जल्दी से चिकित्सा करनी चाहिये । चूंकि इन रोगियों की उपेक्षा करने से वातादि दोष अपने स्थान से च्युत