भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 506

५२२ चरकसंहिता [अ० १३ होकर परिपाक के कारण द्रव बनकर सन्धि ओर स्रोतो को क्लिन्न (आर्द्र) कर देते है। पसीना भी बाह्य स्रोतो के बन्द होने से बाहर न निकल कर तिरछा अन्दर ही जाकर इस जलको बढाता है। जिससे पिच्छा (सिम्बल की गोंद के समान लेस) उत्पन्न हो जाती है। पिच्छा उत्पन्न होने पर पेट गोल, भारी, स्तिमित, तथा टकराने पर कोमल शब्द वाला, कोमल स्पर्शयुक्त होता है। रेखाये सब नष्ट हो जाती है, नाभि पर छूने से ही फैलने लगता है (तरंग चल जाती है) ॥ ४८ ॥ तत्र पिच्छोत्पत्तौ मण्डलमुदरं गुरु स्तिमितमाकोठितमशब्दं मृदु- स्पर्शमपगतराजीकमाक्रान्तं नाभ्यामेवोपसर्पतीति। ततोऽनन्तरमुदकप्रा- दुर्भावः। तस्य रूपाणि-कुक्षेरतिमात्रवृद्धिः सिरान्तर्धानगमनमुदक-पूर्ण- दृतिसंक्षोभम्पर्शश्च, तदातुरमुपद्रवाः स्पृशन्ति छर्द्यतीसार-तमक-तृष्णा- श्वास-कास-हिक्का-दौर्बल्य-पार्श्व-शूलारुचि-स्वरभेद-मूत्रसङ्गादयः, तथा- विधमचिकित्स्यं विद्यादिति ॥ ४६ ॥ पिच्छा के उत्पन्न होने के पीछे उदक (पानी) पैदा होता है। लक्षण— पार्श्वो मे बहुत वृद्धि हो जाती है। सिराये नही दीखती। पानी से भरी मशक के समान स्पर्श और संक्षोभ (गति) होता है। इसके आगे रोगी का वमन, अतिसार, तमक श्वास, प्यास, कास, हिचकी, दुर्बलता, पार्श्वशूल, अरुचि, स्वर- भेद, मूत्रावरोध आदि अनेक उपद्रव होने प्रारम्भ हो जाते है, इन उपद्रवो के होने पर रोगी असाध्य हो जाता है । ४६ ॥ इस प्रसङ्ग मे— भवति चात्र—वातात्पित्तात्कफात्प्लीह्नः सन्निपातात्तथोदकात् । परं परं कृच्छ्रतरमुदरं भिषगादिशेत् ॥ ५० ॥ वैद्य वायु से पित्तजन्य, पित्त से कफजन्य, कफ से प्लीहोदर, प्लीहोदर से सन्निपातोदर, सन्निपातोदर से दकोदर को कष्टसाध्य समझे ॥ ५० ॥ १ अष्टाङ्गसग्रह मे कहा भी है— उपेक्षया च सर्वेषु दोषा. स्वस्थानतश्च्युता.। पाकाद् द्रवा द्रवीकुर्युः सन्धीन् स्रोतोमुखान्यपि ॥ स्वेदस्तु बाह्यस्रोतःसु विहतस्तिर्यगास्थित.। तदेवोदकमाप्याय पिच्छा कुर्यात्तदा भवेत् । गुरुदर स्थिर वृत्तमाहत च सशब्दवत् ॥