भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५२३ पक्षाद् बद्धगुदं तूर्ध्वं सर्वं जातोदकं तथा । प्रायो भवत्यभावाय छिद्रान्त्रं चोदरं नृणाम् ॥ ५१ ॥ बद्धगुदोदर और छिद्रान्त्रोदर दोनो पन्द्रह दिन के पीछे और दकोदर उत्पन्न होने के साथ ही प्राय नाश का कारण होता है। [ दकोदर, छिद्रोदर और बद्धगुदोदर ये अनुकूल चिकित्सा से कभी अच्छे भी हो जाते है। चक्र०] ५१ शूनाक्षं कुटिलोपस्थमुपक्लिन्नतनुत्वचम् । बलशोणितमासाग्निपरिक्षीणं च सत्यजेत् ॥ ५२ ॥ श्वयथुः सर्वमर्मोत्थः श्वासो हिक्काऽरुचिः सतृट् । मूर्च्छा च्छर्दिरतीसारो च निहन्त्युदरिणं नरम् ॥ ५३ ॥ असाध्य रोगी—जिस रोगी की आखें सूज जाये इन्द्रिय (लिङ्ग) कुटिल (टेड़ा) हो जाये, रागी की त्वचा क्लिन्न (विक्लेदयुक्त) और पतली हा, बल, रक्त, मास और अग्नि क्षीण हो जाये, ऐसे रोगी की चिकित्सा न करे। यदि हृदय आदि सब मर्म स्थानो पर शोथ हो जाये, रोगी को श्वास, हिचकी और मूर्च्छा, अरुचि, वमन तथा अतिसार हो उस रोगी को उदर रोग मार ही देता है। वैद्य उसको असाध्य समझे और छोड दे ॥ ५२-५३ ॥ जन्मनैवोदरं सर्वं प्रायः कृच्छ्रतमं मतम् । बलिनस्तदजाताम्बु यत्नसाध्यं नवोत्थितम् ॥ ५४ ॥ प्राय सब उदर-राग उत्पन्न होने के साथ ही कष्टसाध्य होते है। यदि रोगी बलवान् हो तो पानी उत्पन्न हाने के पूर्व ही तथा राग नया हो तो यत्नपूर्वक चिकित्सा करने मे साध्य है ॥ ५४ ॥ अशोथमरुणाभासं सशब्दं नातिभारिकम् । सदा गुडगुडायन्तं सिराजालगवाक्षितम् ॥ ५५ ॥ नाभिं विष्टभ्य पायौ तु वेगं कृत्वा प्रणश्यति । हृन्नाभिवंक्षणकटीगुदप्रत्येकशूलिनः ॥ ५६ ॥ कर्कशं सृजतो वातं नातिमन्दे च पावके। लाल्या विरसे चास्ये मूत्रेऽल्पे संहते विषि ॥ ५७ ॥ अजातोदकमित्येतैर्लिङ्गैर्विज्ञाय तत्त्वतः । उपक्रमेद्भिषग्दोषबलकालविशेषवित् ॥ ५८ ॥ अजातोदक के लक्षण—उदर मे शोथ न हो, लाल वर्ण हलका सा दीखे, शब्द युक्त हो, बहुत अधिक भारीपन न हो, सदा गुडगुड शब्द आता हो, सिरा जाल दिखाई देता हो, वायु नाभि और आतो मे वेग करके छिप जाती हो, हृदय, नाभि, वक्षण, कटि, गुदा मे शूल रहता हो, कर्कश वायु बाहर