चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३३
एभिः स्निग्धाय संजाते बले शान्ते च मारुते ॥ ११७॥
स्रस्ते दोषाशये दद्यात्कल्पदृष्टं विरेचनम् ।
पटोलमूलरजनी विडङ्गत्रिफलात्वचम् ॥ ११८ ॥
कम्पिल्लको नीलिनी च त्रिवृता चेति चूर्णयेत् ।
षडाद्यान्कार्षिकांस्तन्त्याँस्त्रींश्च द्वित्रिचतुर्गुणान् ॥ ११९ ॥
कृत्वा चूर्णमतो मुष्टिं गवा मूत्रेण वा पिबेत् ।
विरिक्तो मृदु भुञ्जीत भोजनं जाङ्गलै रसैः ॥ १२० ॥
मण्डं पेया च पीत्वा वा सव्योषं षडहं पयः ।
शृतं पिबेत्ततश्चूर्णं पिबेदेवं पुनः पुनः ॥ १२१ ॥
हन्ति सर्वादरगण्येतच्चूर्णं जातोदकान्यपि ।
कामला पाण्डुरोगं च श्वयथु चापकर्षति ॥ १२२ ॥
पटोलाद्यमिदं चूर्णमुदरेषु प्रपूजितम् ।
इति पटोलाद्यं चूर्णम् ।
( १ ) पटोलमूलादे चूर्ण—पटोलमूल, हल्दी, बायविडंग, हरड, बहेडा,
आवले की छाल, कमीला, नोल, निशोथ इन सब का चूर्ण करले । इनमें पटोल-
मूल, हल्दी विडंग और त्रिफला की छाल प्रत्येक द्रव्य एक एक कर्ष, कमीला
दो कर्ष, नील तीन कर्ष और निशोथ चार कर्ष ले इस चूर्ण की एक पल-मात्रा
को गोमूत्र के साथ पीये। इससे भली प्रकार विरेचन होने पर जांगल पशुओ के
मास-रस के साथ भोजन करे । पेया और मण्ड को पीकर सोंठ, मरिच, पिप्पली
के साथ पकाया दूध छ दिन तक पीये। सातवे दिन फिर चूर्ण को पीये। इस
प्रकार से बार-बार करना चाहिये। यह चूर्ण सब प्रकार के उदर रोगो को,
उदकोदर को, कामला, पाण्डु ओर शोथ रोग को नष्ट करता है। उदर-रोगों मे
पटोलाद्य चूर्ण की अधिक प्रतिष्ठा है १ ॥११७-१२२॥
गवाक्षीं शङ्खिनीं दन्ती तिल्वकस्य त्वचं वचाम् ॥ १२३ ॥
पिबेद् द्राक्षाम्बुगोमूत्रकोलकर्केन्धुशीधुभिः ।
(२) गवाक्षी ( इन्द्रायण ), शंखिनी, दन्ती, तिल्वक की छाल, वच
इनका चूर्ण करले । इस चूर्ण को द्राक्षा क्वाथ, गोमूत्र, बड़े और छोटे बेर के
क्वाथ अथवा सीधु इनमे से किसी एक के साथ पीना चाहिये ॥१२३॥
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१ अष्टाङ्गसग्रह मे भी—पटोलमूलरजनीविडगत्रिफला कर्शांशा , कम्पिल्लक-
नीलिनीफलत्रिवृताना क्रमाद् द्वित्रिचतुर्भि कर्षैर्युक्तांश्चूर्णयित्वा मूत्रेण पिबेत् । जीर्णे
च पेयामण्डपो रसौदनाशी वा स्यात् । ततः षड्रात्रमित्यादि । सग्रह अ० चि० १७ ।