चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 518, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें५३४ चरकसंहिता [अ० १३ यवानी हपुषा धान्यं त्रिफला चोपकुञ्चिका ॥ १२४ ॥ कारवी पिप्पलीमूलमजगन्धा शटी वचा । शताह्वा जीरकं व्योषं स्वर्णक्षीरी सचित्रका ॥ १२५ ॥ द्वौ क्षारौ पौष्करं मूलं कुष्ठं लवणपञ्चकम् । विडङ्गं च समांशानि दन्त्या भागत्रयं १ तथा ॥ १२६ ॥ त्रिवृद्विशालयोर्द्वौ द्वौ सातला स्याच्चतुर्गुणा । एतन्नारायणं नाम चूर्ण रोगगणापहम् ॥ १२७ ॥ नैतन्प्राप्यातिवर्तन्ते रोगा विष्णुमिवासुराः । (३) नारायण चूर्ण—अजवायन, हऊबेर, धनिया, त्रिफला, उपकुञ्चिका (काला जीरा) कारवी (छोटा जीरा), पिप्पलीमूल, अजगन्धा (अजवायन), सोंठ, वच, सोफ, जीरा, त्रिकटु, स्वर्णक्षीरी (हैमवती), चीता, यवक्षार, सर्ज- क्षार, पुष्करमूल, कूठ, सेन्धा नमक, सामुद्रक, संचल, विड् और उद्भिद् नमक बायविडंग ये सब द्रव्य समभाग, दन्ती तीन भाग, निगोथ और विशाला ये दो- दो भाग, सातला चार भाग मिला कर चूर्ण कर लेना चाहिये । यह नारायण- चूर्ण सब रोगो का नाशक है । जिस प्रकार से विष्णु भगवान् के सामने असुर नहीं खड़े रहते है, उसी प्रकार से इसके सामने रोग नहीं ठहरते, इसलिये इसका नाम नारायण-चूर्ण है ॥१२४-१२७॥ तक्रेणोदरिभिः पेयं गुल्मिभिर्बदराम्बुना ॥१२८॥ आनद्धवाते सुरया वातरोगे प्रसन्नया । दधिमण्डेन विट्सङ्गे दाडिमाम्बुभिरर्शसैः ॥ १२६ ॥ परिकर्ते सवृक्षाम्लमुष्णाम्बुभिरजीर्णके । उदर-रोगी को यह चूर्ण तक्र के साथ, गुल्म-रोगी को बदर (बेर) के क्वाथ के साथ, वात-विबन्ध मे सुरा के साथ, वात-रोग मे प्रसन्ना (मद्य के ऊपर के स्वच्छ भाग) के साथ, मलावरोध मे दधि-मण्ड के साथ, अर्श रोग में अनार के रस के साथ, परिकर्त्तिका-रोग मे वृक्षाम्ल क्वाथ के साथ, अजीर्ण मे गरम पानी के साथ पीना चाहिये ॥१२८-१२६॥ भगन्दरे पाण्डुरोगे श्वासे कासे गलग्रहे ॥ १३० ॥ हृद्रोगे ग्रहणीदोषे कुष्ठे मन्देऽनले ज्वरे । दंष्ट्राविषे मूलविषे सगरे कृत्रिमे विषे ॥ १३१ ॥ १. 'विडङ्गस्य समाशानि दन्त्या भागास्त्रयस्तथा' इति वा पाठः ।