चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
५३४ चरकसंहिता [अ० १३ यवानी हपुषा धान्यं त्रिफला चोपकुञ्चिका ॥ १२४ ॥ कारवी पिप्पलीमूलमजगन्धा शटी वचा । शताह्वा जीरकं व्योषं स्वर्णक्षीरी सचित्रका ॥ १२५ ॥ द्वौ क्षारौ पौष्करं मूलं कुष्ठं लवणपञ्चकम् । विडङ्गं च समांशानि दन्त्या भागत्रयं १ तथा ॥ १२६ ॥ त्रिवृद्विशालयोर्द्वौ द्वौ सातला स्याच्चतुर्गुणा । एतन्नारायणं नाम चूर्ण रोगगणापहम् ॥ १२७ ॥ नैतन्प्राप्यातिवर्तन्ते रोगा विष्णुमिवासुराः । (३) नारायण चूर्ण—अजवायन, हऊबेर, धनिया, त्रिफला, उपकुञ्चिका (काला जीरा) कारवी (छोटा जीरा), पिप्पलीमूल, अजगन्धा (अजवायन), सोंठ, वच, सोफ, जीरा, त्रिकटु, स्वर्णक्षीरी (हैमवती), चीता, यवक्षार, सर्ज- क्षार, पुष्करमूल, कूठ, सेन्धा नमक, सामुद्रक, संचल, विड् और उद्भिद् नमक बायविडंग ये सब द्रव्य समभाग, दन्ती तीन भाग, निगोथ और विशाला ये दो- दो भाग, सातला चार भाग मिला कर चूर्ण कर लेना चाहिये । यह नारायण- चूर्ण सब रोगो का नाशक है । जिस प्रकार से विष्णु भगवान् के सामने असुर नहीं खड़े रहते है, उसी प्रकार से इसके सामने रोग नहीं ठहरते, इसलिये इसका नाम नारायण-चूर्ण है ॥१२४-१२७॥ तक्रेणोदरिभिः पेयं गुल्मिभिर्बदराम्बुना ॥१२८॥ आनद्धवाते सुरया वातरोगे प्रसन्नया । दधिमण्डेन विट्सङ्गे दाडिमाम्बुभिरर्शसैः ॥ १२६ ॥ परिकर्ते सवृक्षाम्लमुष्णाम्बुभिरजीर्णके । उदर-रोगी को यह चूर्ण तक्र के साथ, गुल्म-रोगी को बदर (बेर) के क्वाथ के साथ, वात-विबन्ध मे सुरा के साथ, वात-रोग मे प्रसन्ना (मद्य के ऊपर के स्वच्छ भाग) के साथ, मलावरोध मे दधि-मण्ड के साथ, अर्श रोग में अनार के रस के साथ, परिकर्त्तिका-रोग मे वृक्षाम्ल क्वाथ के साथ, अजीर्ण मे गरम पानी के साथ पीना चाहिये ॥१२८-१२६॥ भगन्दरे पाण्डुरोगे श्वासे कासे गलग्रहे ॥ १३० ॥ हृद्रोगे ग्रहणीदोषे कुष्ठे मन्देऽनले ज्वरे । दंष्ट्राविषे मूलविषे सगरे कृत्रिमे विषे ॥ १३१ ॥ १. 'विडङ्गस्य समाशानि दन्त्या भागास्त्रयस्तथा' इति वा पाठः ।
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३५
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३५ यथार्हं१ स्निग्धकोष्ठेन पेयमेतद्विरेचनम् । इति नारायणचूर्णम् । भगन्दर, पाण्डुरोग, श्वास, कास, गलग्रह, हृदयरोग, ग्रहणीरोग, कूठ, अग्निमान्द्य, ज्वर, दंष्ट्रा-विष ( जागम विष ), मूल विष ( स्थावर विष ), सगर ( निर्विष द्रव्य सयोगज विष ) मे और कृत्रिम ( विष द्रव्य सयोगज विष ) मे यथायोग अनुपान के साथ पीना चाहिये२ ॥ १३०-१३१ ॥ हपुषा काञ्चनक्षीरी त्रिफला कटुरोहिणी ॥ १३२ ॥ नीलिनी त्रायमाणा च शातला त्रिवृता वचा । सैन्धवं काललवणं पिप्पली चेति चूर्णयेत् ॥ १३३ ॥ दाडिमत्रिफलामासरसमूत्रसुखोदकैः । पेयोऽयं सर्वगुल्मेषु प्लीह्नि सर्वोदरेषु च ॥ १३४ ॥ कुष्ठे श्वित्रे सरुजके सवाते विषमाग्निषु । शोथार्शःपाण्डुरोगेषु कामलाया हलीमकै ॥ १३५ ॥ वातं पित्त कफ चाऽऽशु विरेकात्सप्रसाधयेत् । इति हपुषाद्य चूर्णम् । ( ४ ) हपुषाद्य-चूर्ण—हपुषा ( हऊबेर ), स्वर्ण क्षारी, त्रिफला, कुटकी, नीलिनी, त्रायमाणा, सातला, निशोथ, वच, सैन्वा नमक, काला लवण ( सचल या बिड् नमक ), पिप्पली ये सब समान भाग लेकर चूर्ण कर ले । इस चूर्ण को सब प्रकार के गुल्मो मे, प्लीहा मे उदर-रोगो मे, कुष्ठ मे, श्वित्र-रोग में, दर्द युक्त उदर-रोग मे, वातयुक्त उदर विकार मे, अग्नि के विषम होने पर, शोथ, अर्श, पाण्डुरोग, कामला और हलीमक-राग मे, अनार, त्रिफला, मास रस, मूत्र और गरम पानी जो योग्य अनुपान इनमे से दीखे उसके साथ लेना चाहिये । अनार का रस ओर त्रिफला का क्वाथ बरतना चाहिये । इस प्रकार लेने से यह चूर्ण विरेचन द्वारा वात, पित्त, कफ का साधन कर देता है ॥१३२-१३५॥ नीलिनी निचुलं व्योषं द्वौ क्षारौ लवणानि च ॥ १३६ ॥ चित्रक च पिबेच्चूर्णं सर्पिषोदरगुल्मनुत् । इति नीलिल्याद्यं चूर्णम् । १ 'यथार्थ' इति वा पाठः । २ स्थावर जागमं चेति विष प्रोक्तमकृत्रिमम् । कृत्रिम गरसज्ञन्तु क्रियते विविधौषधैः ॥ सयोगे द्विविध प्रोक्तं तृतीय विषमुच्यते । गरं स्यादविषं तत्र सविष कृत्रिमं मतम् ॥
५३६ चरकसंहिता [ अ० १३ (५) नीलिन्याद्य-चूर्ण—नीलिनी, निचुल (जलवेतस), सर्जक्षार और यवक्षार, सैन्धव, सामुद्र, विड्, सवल और उद्भिद्, चित्रक ये सब समान भाग लेकर चूर्ण कर लेने चाहिये । इस चूर्ण को घी के साथ पीने से उदर और गुल्म-रोग शान्त होते हैं ॥ १३६-॥ क्षीरद्रोणं सुधाक्षीरप्रस्थार्धसहितं दधि ॥ १३७ ॥ जातं विमथ्य तद्युक्त्या त्रिवृत्सिद्धं पिबेद् घृतम् । तथा सिद्धं घृतप्रस्थं पयस्यष्टगुणे पिबेत् ॥ १३८ ॥ (६) स्नुही क्षीर—दूध एक द्रोण (चार आढक), स्नुही (थोर) का दूध आधा प्रस्थ (८ पल) मिला कर दही जमानी चाहिये । इस दही का मथ कर घी निकालना चाहिये । फिर त्रिवृत् का कल्क चौथाई भाग और जल चार भाग और यह तैयार घृत १ भाग लेकर घृत सिद्ध करना चाहिये । इस घी का उचित मात्रा में पीना चाहिये ॥ १३७-१३८ ॥ स्नुक्क्षीरपलकल्केन त्रिवृता षट्पलेन च । गुल्मानां गरदोषाणामुदराणां च शान्तये ॥ १३९ ॥ इति स्नुहीक्षीरघृतम् । (७) उपरोक्त सुधाक्षीर-विधि से बनाये घृत को, आठ गुणे दूध में, थोर का दूध १ पल और निशोथ का चूर्ण ६ पल इनके कल्क के साथ सिद्ध करके पीना चाहिये ॥ १३९ ॥ दधिमण्डाढके सिद्धात्स्नुक्क्षीरपलकल्कितान् । घृतप्रस्थात्पिबेन्मात्रां तद्गज्जठरशान्तये ॥ १४० ॥ (८) दधि मण्ड (दही का मस्तु) १ आढक, स्नुही का दूध १ पल, घृत १ प्रस्थ इनको यथाविधि पाक करके कोष्ठापेक्षी मात्रा में पीने से उदर-रोग शान्त होते हैं ॥ १४० एषां चानुपिबेत्पेयां पयो वा स्वादु वा रसम् । घृते जीर्णे विरिक्तस्तु कोष्णं १ नागरकैः शृतम् ॥ १४१ ॥ पिबेदम्बु ततः २ पेयां यूषं कोलत्थकं ततः । पिबेद् रूक्षस्त्र्यहं त्वेवं पयोऽन्नं ३ प्रतिभोजितः ॥ १४२ ॥ पुनः पुनः पिबेत्सर्पिरानुपूर्व्या तथैव च । घृतान्येतानि सिद्धानि विदध्यात्कुशलो भिषक् ॥ १४३ ॥ गुल्मानां गरदोषाणामुदराणां च शान्तये । १ 'घृते जीर्णे विरिक्त तु काष्णनागरकैः' इति । २. 'शुण्ठ्या पिबेत् ततः' इति च । ३ 'पयो वा' इति पाठान्तरम् ।
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३७ इन उपरोक्त घृतो को पीकर अनुपान रूप मे मधुर दूध या मास-रस पीना चाहिये । इस प्रकार करने से विरेचन होने पर घृत के जीर्ण हो जाने पर सोठ के साथ पकाया गरम पानी पीना चाहिये । पीछे से पेया पीनी चाहिये । फिर कुलत्थी का यूष पीये । प्रथम दिन सोठ से साधित पानी, दूसरे दिन पेया और तीसरे दिन कुलत्थी का यूष पीना चाहिये । यह स्नेह विरेचन रूक्षव्यक्ति को ही करना चाहिये । फिर दूध के साथ अन्न खाना चाहिये । इस प्रकार से तीन दिन घृत पान करे । जब तक स्निग्ध न हो जाये बार-बार घृत पान करे । कुशल वैद्य को चाहिये कि गुल्म-रोग, गर-दोषो मे, उदर रोगो की शान्ति के लिये इन सिद्धफल घृतों को बनाये ॥ १४१-१४३ ॥ पीलुश्व॰कोपसिद्धं वा घृतमानाहभेदनम् ॥ १४४ ॥ गुल्मघ्नं नीलिनीसर्पिः स्नेहं वा मिश्रकं पिबेत् । पीलु के चतुर्थांश कल्क द्वारा चतुर्गुण पानी मे सिद्ध घृत आनाह को नष्ट करता है । नीलिन्यादि-घृत तथा मिश्रक-स्नेह जा कि गुल्म-रोग मे कहे है, उनको पीना चाहिये ॥ १४४ ॥ क्रमान्निहृतदोषाणां जाङ्गलप्रतिभोजिनाम् ॥ १४५ ॥ दोषशेषनिवृत्त्यर्थं योगान्वक्ष्याम्यतः परम् । इस प्रकार से उदर-रोगी का विरेचन द्वारा शोधन होने पर जांगल मास रस के साथ अन्न देना चाहिये । इसके आगे शेष दोष की शान्ति के लिये योगों को कहने है ॥ १४५ ॥ चित्रकामदारुभ्या कल्कं क्षीरेण ना पिबेत् ॥ १४६ ॥ मासयुक्तं तथा हस्तिपिप्पली विश्वभेषजम् । ( १ ) उदर रोगी को जितेन्द्रिय होकर एक मास तक चीता और देवदारु के कल्क को अथवा हस्तिपिप्पली ( अष्टागसग्रह के मत से चविका ) और सोठ इनके कल्क का दूध के साथ पीना चाहिये १ ॥ १४६ ॥ विडङ्गं चित्रक दन्ती चव्यं व्योष च तैः समैः ॥ १४७ ॥ कल्कैः कोलसमैः पीत्वा प्रवृद्धमुदर जयेत् । ( २ ) बायावडंग, चीता, दन्ती, चव्य, सोठ, मरिच, पिप्पली प्रत्येक दो शाण लेकर चतुर्गुण जल मे दूध सिद्ध करके पीने से उदर रोग शान्त होता है ॥१४७॥ पिबेत्कषायं त्रिफलादन्तीरोहितकैः शृतम् ॥ १४८ ॥ व्योषक्षारयुतं जीर्णे रसैरद्यात्तु २ जाङ्गलैः । १. दोषशेषविजयाय च शीलयेच्चविकानागर क्षीरेण पिष्टम् । सग्रह०अ०चि०१७ २ रसैरद्यात्सजाङ्गलै इति वा ।
५३८ चरकसंहिता [ अ० १३
मांसं वा भोजनं योज्यं सुधाक्षीरघृतान्वितम् ॥ १४६ ॥
क्षीरानुपानं गोमूत्रेणाभयां वा प्रयोजयेत् ।
(३) त्रिफला दन्ती और रोहेड़े के क्वाथ मे सोंठ, मरिच, पिप्पली और
यवक्षार मिला कर पीना चाहिये । औषध के जीर्ण होने पर जाङ्गल मांस-रस के
साथ भोजन करना चाहिये । अथवा पूर्वोक्त सुधा-दूध से साधित घृत के साथ
मांस या भोजन खाना चाहिये । गोमूत्र के साथ हरड खा कर ऊपर से दूध
पीना चाहिये ॥ १४८-१४६ ॥
सप्ताहं माहिषं मूत्र क्षीर चानन्नभुक् पिबेन् ॥ १५० ॥
मासमोष्ट्र पयश्छागं त्रीन्मासान् व्योपसंयुतम् ।
(४) और सब प्रकार का अन्न छोड़ कर एक सप्ताह तक भैंस का मूत्र
और दूध ( त्रिकटु मिला कर ) पीना चाहिये, एक मास तक ऊठ का दूध
( त्रिकटु मिला कर ) पीना चाहिये । तीन मास तक त्रिकटु मिला कर बकरी
का दूध पीना चाहिये ॥ १५०-॥
हरीतकीसहस्रं वा क्षीराशी वा शिलाजतु ॥ १५१ ॥
शिलाजतुविधानेन गुग्गुलुं वा प्रयोजयेत् ।
(५) केवल दूध पर रहते हुए वर्धमान-पिप्पली विधि से एक हजार
हरड़ो का सेवन करना चाहिये । अथवा शिलाजतु की विधि से शिलाजीत या
गुग्गुलु का प्रयोग करना चाहिये ॥ १५१- ॥
शृङ्गवेरार्द्रकरसः पाने क्षीरसमो मतः ॥ १५२ ॥
तैलं रसेन तेनैव सिद्धं दशगुणेन वा ।
(६) दूध के बराबर भाग मे आर्द्रक का रस मिला कर पीना चाहिये ।
आर्द्रक का रस १० भाग और तैल १ भाग लेकर सिद्ध करना चाहिये । यह
तैल पीना चाहिये ॥ १५२- ॥
दन्तीद्रवन्तीफलजं तैल दूष्योदरे हितम् ॥ १५३ ॥
शूलानाहविबन्धेषु सक्तुयूपरसादिभिः ।
(७) दूष्योदर ( सन्निपातोदर ) मे दन्ती-फल और द्रवन्ती-फल का तैल
पीना चाहिये । शूल, आनाह, विबन्ध मे यह तैल मस्तु, यूष, या मास रस के
साथ लेना चाहिये ॥ १५३- ॥
सरलामधुशिग्रूणां बीजेभ्यो मूलकस्य च ॥ १५४ ॥
तैलान्यभ्यङ्गपानार्थं शूलघ्नान्यनिलोदरे ।
(८) वातोदर मे—सरला, मधु, शिग्रु (लाल सहजन) और मूली के बीजसे
उत्पन्न तैल अभ्यग और पान करनेमें हितकारी हैं। ये शूलनाशक हैं ॥ १५४- ॥
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३६
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३६ स्तैमित्यारुचिहृल्लासेष्वल्पानौ मद्यपाय च॑१ ॥ १५५ ॥ अरिष्टान् दापयेत्२ क्षारान्कफस्त्यानस्थिरोदरे । श्लेष्मणो विलयार्थं तु दोषं वीक्ष्य भिषग्वरः ३ ॥ १५६ ॥ (६) वैद्य को चाहिये कि स्तिमितता (गीले वस्त्र से आच्छादित की भाति ), अरुचि, जी मचलना, अग्नि मान्द्य, रोगी के मद्यपी होने पर कफजन्य उदर यदि कठिन ओर स्थिर हो ता कफ के विलयन के लिये अरिष्टो का प्रयोग करे ॥ १५५-१५६ ॥ पिप्पली तिल्वकं हिङ्गु नागर हस्तिपिप्पलीम् । भल्लातकं शिग्रुफल त्रिफला कटुरोहिणीम् ॥ १५७॥ देवदारु हरिद्रे द्वे सरलातिविषे वचाम् । कुष्ठं मुस्तं तथा पञ्च लवणानि प्रकल्प्य च ॥ १५८ ॥ दधिसर्पिर्वसातैलमज्जयुक्तानि दाहयेत् । अन्नादूर्ध्वमतः क्षाराद्विडालकपदं पिवेत् ॥ १५६ ॥ मदिरादधिमण्डोष्णजलारिष्टसुरासवैः । (१०) पिप्पली, तिन्दुक, हींग, साठ, गजपिप्पली, भिलावा, सहजन का फल, त्रिफला, कुटकी, देवदारू, हल्दी, दारुहल्दी, सरला, अतिविषा (अतीस), स्थिरा (शालिपर्णी), कूठ, मोथा और पाचो नमक (सैन्धव, सचल, सामुद्र, विड् ओर उद्भिद्) ये सब द्रव्य समान भाग लेकर इनको दही, घी, वसा, मज्जा, ओर तेल म मिला करके [हाण्डी मे बन्द कर उपलो मे रखकर ] जलाना चाहिये ॥ १५७-१५६ ॥ हृद्रोगं श्वयथु गुल्मं प्लीहार्शोजठराणि च ॥ १६० ॥ विषूचिकामुदावत्त वाताष्ठीला च नाशयेत् । भाजन के पीछे इस क्षार की एक कर्ष-मात्रा का मादरा, दधि-मस्तु, गरम जल, अरिष्ट, सुरा या आसव किसी एक वस्तु मे घोल कर पीना चाहिये । यह क्षार हृदयरोग, शाथ, गुल्म, प्लीहा, अर्श, उदर-रोग, विसूचिका, उदावर्त्त और वाताष्ठीला का नष्ट करता है४ ॥१६०॥ १. 'मद्यपस्तथा' इति च । २ 'अरिष्टान् वा पिवेत्' इति च । ३. इति श्लोकार्धं क्वचिद् नापि पठ्यते । ४ वाताष्ठीला—"नामेरधस्तात् सजातः सञ्चारी यदि वाचलः । अष्ठीलावद् घनो ग्रन्थिरूर्ध्वमायात उन्नतः । वाताष्ठीला विजानीयात् ॥ निदान० ॥
५४० चरकसंहिता [ अ० १३
क्षारं चाजकरीषाणां स्रुतं मूत्रैर्विपाचयेत् ॥ १६१ ॥
कार्षिकं पिप्पलीमूलं पञ्चैव लवणानि च ।
पिप्पलीं चित्रकं शुण्ठीं त्रिफलां त्रिवृतां वचाम् ॥ १६२ ॥
द्वौ क्षारौ शातलां दन्तीं स्वर्णक्षीरीं विषाणिकाम् ।
कोलप्रमाणं वटिकां पिबेत्सौवीरर् युताम् ॥ १६३ ॥
श्वयथावविपाके च प्रवृद्धे चोदकोदरे ।
(११) बकरी की मीगनियो को जला कर इस भस्म को छ गुणे पानी मे
घोल लेना चाहिये, फिर इस पानी को नितार लेना चाहिये । दूसरी बार फिर
पानी मिला कर फिर नितार लेना चाहिये । इस प्रकार इक्कीस बार करके क्षारो-
दक बना कर इसको पका कर क्षार बनाना चाहिये । यह क्षार एक कर्ष,
पिप्पलीमूल, सैन्धव, सचल, सामुद्र, विड, उद्भिद् पाचो नमक, पिप्पली,
चित्रक, सोठ, त्रिफला, निशोथ, वच, यवक्षार, सर्जक्षार, मातला, दन्ती, सत्या-
नाशी और विषाणिका ( मेढासिगी ) इनका समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना
चाहिये । इन सब चूर्ण और क्षार का गोमूत्र मे पकाना चाहिये । पकाने पर
जब गाढा हो जाय तब बेर के बराबर दो शाण की गोली बना कर सौवीरक-
काजी के साथ पीना चाहिये । इससे शोथ, अविपाक और उदकोदर नष्ट होता
है । इसको भोजन के पीछे पीना चाहिये ॥१६१-१६३॥
भावितानां गवां मूत्रे षष्टिकानां तु तण्डुलैः ॥ १६४ ॥
यवागूं पयसा सिद्धां प्रकामं भोजयेन्नरम् ।
पिबेदिक्षुरसं चानु जठराणां निवृत्तये ॥ १६५ ॥
स्वं स्वं स्थानं व्रजन्त्येषां तथा पित्तकफानिलाः ।
(१२) उदर रोग की शान्ति के लिये साठी के चावलो को गोमूत्र मे
भिगो कर इनके द्वारा दूध मे यवागू सिद्ध करनी चाहिये । रोगी का यह यवागू
यथेच्छ खिलानी चाहिये । पीछे से गन्ने का रस पीना चाहिये । इस प्रकार करने
से उन्मार्ग मे गये वात, पित्त, कफ दोष अपने स्थान मे आ जाते है ॥१६४-१६५॥
शङ्खिनीस्नुक्त्रिवृद्दन्तीचिरिबिल्वादिपल्लवैः ॥ १६६ ॥
शाकं गाढपुरीषाय प्राग्भक्तं दापयेद्भिषक् ।
ततोऽस्मै शिथिलीभूतवर्चोदोषाय शास्त्रवित् ॥ १६७ ॥
दद्यान्मूत्रयुतं क्षीरं दोषशेषहरं शिवम् ।
( १३) मल कठिन हो तो रोगी को भोजन से पूर्व शंखिनी, स्नुही (थोर),
निशोथ, दन्ती, चिरिबिल्व ( करज ) आदि वृक्षों के पत्तों का शाक खिलाना
अ० १३] चिकित्सितस्थानम् ५४१ चाहिये । इनके कारण से मल ओर दोष के शिथिल होने पर शेष दोष का निका- लने के लिये कल्याणकारी क्षार क मूत्र के साथ देना चाहिये ॥१६६-१६७॥ पार्श्वशूलोपस्तम्भं हृद्ग्रहं चापि मारुतम् ॥ १६८ ॥ जनयेद्यस्य तैल स बिल्वक्षारेण ना पिवेत् । (१४) जिम उदर-रोगी ने वायु पार्श्वशूल, ऊरुस्तम्भ और हृदय-पीड़ा को उत्पन्न करदे, उसको बिल्व क्षारोदक के साथ तैल पिलाना चाहिये ॥१६८॥ तथाऽग्निमन्थश्योनाकपलाशतिलनालजैः ॥ १६९ ॥ बलाकदल्यपामार्गक्षारैः प्रत्येकशः स्रुतैः । तैलं पक्त्वा भिषग् दद्यादुदराणां प्रशान्तये ॥ १७० ॥ निवर्तते चोदरिणां हृद्ग्रहश्चानिलोद्भवः । (१५) इसी प्रकार से अग्निमन्थ, स्योनाक, ढाक, तिल नाल इनसे तैयार किये क्षार, खरैटी, केला, अपामार्ग इनके बनाये क्षारो को छ गुणे पानी मे घोल कर इक्कीस बार नितार लेना चाहिये । इस क्षारोदक से तेल पकाना चाहिये । अग्निमन्थ आदि साता के क्षारो से पृथक् पृथक् तैल सिद्ध करना चाहिये । यह तल उदर रोगी को देना चाहिये । इसस वातजन्य१ हृदयग्रह और पार्श्वशूल मिटते ह ॥ १६६-१७० ॥ कफे वातेन पित्तेन ताभ्या वाऽप्यावृतेऽनिले ॥ १७१ ॥ बलिनः स्वौषधयुतं तैलमैरण्डजं हितम् । (१६) वायु द्वारा कफ के या वायु द्वारा पित्त के अथवा पित्त-कफ दोनो से वायु के आवृत होने पर बलवान् उदररोगी को अपनी औषध से सिद्ध एरण्ड तैल देना चाहिये ॥ १७१ ॥ सुविरिक्तो नरो यस्तु पुनराधमतीह तम् ॥ १७२ ॥ सुस्निग्धरम्ललवणैर्निरूहैः समुपाचरेत् । सोपस्तम्भोऽपि वा वायुराध्मापयति यं नरम् ॥ १७३ ॥ तीक्ष्णैः सक्षारगोमूत्रैर्बस्तिभिस्तमुपाचरेत् । (१७) यदि रोगी का भली प्रकार विरेचन देन पर तथा वस्त्र से पेट बाधने पर भी आध्मान-अफारा हा जाये तो स्निग्ध, अम्ल, लवण से सिद्ध निरूह बस्तियो से चिकित्सा करनी चाहिये । यदि वस्त्र बाधने पर भी वायु आध्मान करे तो क्षार गोमूत्र युक्त तीक्ष्ण बस्तियो द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥१७२-१७३॥ १ वातकृतेषु पार्श्वशूलोपस्तम्भहृद्ग्रहेषु बिल्वक्षाराम्भसा तैल पाययेत् । स्योनाका- म्निमन्थतिलकुन्तलकदल्यपामार्गोन्यतमक्षारेण वा विपक्व तैलम् । अष्टागस०चि०१७
५४२ चरकसंहिता [ अ० १३ क्रियातीते त्रिदोषे च जठरे चाप्रशाम्यति ॥ १७४ ॥ ज्ञातीन्सुहृदो दारान्ब्राह्मणान् नृपतीन् गुरून् । अनुज्ञाप्य भिषक्फर्म विदध्यात्संशय ब्रुवन् ॥ १७५ ॥ (१८) सन्निपातादर मे तथा जिस उदररोग मे सम्पूर्ण चिकित्सा विधि करने पर भी रोग शान्त न हो तो वैद्य का चाहिये कि सम्बन्धियो को, मित्रो का, स्त्रियो को, ब्राह्मणो को, राजा को और पूज्यजनो को सूचित करके निम्न कार्य करे ॥ १७४-१७५ ॥ अक्रियायां ध्रुवो मृत्युः क्रियायां संशयो भवेत् । एवमाख्याय तस्येदम॑नुज्ञातः सुहृद्गणैः१ ॥ १७६ ॥ पानभोजनसंयुक्तं विषमस्मै प्रदापयेत् । यस्मिन्वा कुपितः सर्पो विसृजेद्धि फले विषम् ॥ १७७ ॥ भक्षयेत्तदुदरिण प्रविचार्य भिषग्वरः२ । तेनास्य दोषसङ्घातः स्थिरो लीनो विमार्गगः ॥ १७८ ॥ सबों को सूचित करदे कि चिकित्सा के न करने पर तो मृत्यु अवश्यम्भावी है, चिकित्सा करने पर जीवन का सन्देह है, शायद बच भी जाये । इस प्रकार कहकर मित्रों से आज्ञा लेकर वैद्य पीने मे और भोजन में स्थावर-विष का प्रयोग करे । इसके लिये अश्वमारक (कनेर), रत्तिया, काकादनी-मूल के कल्क को मद्य के साथ देना चाहिये । अथवा कुपित कृष्ण सर्प जिस फल को काटे, जिसमे विष छोड देवे, उस फल को विचार कर उदर रोगी को खाने के लिये देना चाहिये । [ यह देख लेना चाहिये कि फल मे विष की मात्रा अधिक तो नही है, इसके लिये किसी पशु या पक्षी को खिलाकर देख लेना चाहिये] ॥१७६-१७८॥ विषेणाशु प्रमाथित्वादाशु भिन्नः प्रवर्तते । विषेण हृतदोष त शीताम्बुपरिषेचितम् ॥ १७९ ॥ पाययेत भिषग् दुग्धं यवागू वा यथाबलम् । त्रिवृन्मण्डूकपर्ण्योश्च शाकं सयववास्तुकम् ॥ १८० ॥ भक्षयेत्कालशाकं वा सुरसोदकसाधितम् । निरम्ललवणस्नेहं स्विन्नास्विन्नमनन्नभुक् ॥ १८१ ॥ मासमेकं ततश्चैव तृषितः स्वरसं पिबेन् । १ इत्यर्ध. श्लोक केषुचित् पुस्तकेषु न पठ्यते । २ 'प्रदापयेत्' इति वा पाठः ।
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५४३
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५४३ विष के प्रमाथी होने से धातु आदि मे छिपे दोष तथा उन्मार्ग मे पहुचे दोष समूह पृथक् होकर शीघ्र ही बाहर निकल आते है । विष के कारण दोष के बहार निकल आने पर रोगी को शीतल जल से स्नान कराके दूध या यवागू खाने के लिये देनी चाहिये । नशोथ, मण्डूकपर्णी, यवशाक, बथुए का शाक और कालशाक इनको इन्ही के स्वरस मे बना कर खाने को देना चाहिये । इन शाको मे अम्ल और लवण न मिला कर कुछ पके और कुछ न पके शाको को एक मास तक बिना किसी और अन्न के खाना चाहिये । प्यास लगने पर इनका ही स्वरस पीना चाहिये ॥ १७६-१८१- ॥ एवं विनिहृते दोषे शाकैर्मासात्परं ततः ॥ १८२ ॥ दुर्बलाय प्रयुञ्जीत प्राणभृत्कारभं पयः । इस प्रकार से एक मास तक रहने पर शाक द्वारा दोषा के निकल जाने से निर्बल हुए रोगी का प्राणदायक ऊट का दूध पिलाना चाहिये ॥ १८२- ॥ इदं तु शल्यहर्तॄणा कर्म स्याद् दृष्टकर्मणाम् ॥ १८३ ॥ वामं कुक्षि मापयित्वा नाभ्यधश्चतुरङ्गुलम् । मात्रायुक्तेन शस्त्रेण पाटयेन्मतिमान् भिषक् ॥ १८४ ॥ विपाट्यान्त्रं ततः पश्चाद्रीक्ष्य बद्धक्षतान्त्रयोः । सर्पिषाऽभ्यज्य केशादीनवमृज्य विमोक्षयेत् ॥ १८५ ॥ (१६) शस्त्र-चिकित्सा—जिन शल्य चिकित्सको ने अनेक बार शस्त्र-कर्म देखा है, उनको छिद्रोदर और बद्धोदर मे शल्य-कर्म करना चाहिये । बुद्धिमान् ओर शस्त्र-कर्म मे कुशल वैद्य बद्ध-गुदोदर और क्षतान्त्रोदर मे नाभि के नीचे वाम भाग मे चार अगुल परिमित स्थान को बचा कर कर्मोचित मात्रा मे शस्त्र से चीरा लगाये । इस प्रकार से कुक्षि को चीर कर और आतो (दोष युक्त आन्त्रभाग) का बाहर निकाल कर इनको देख कर, केश आदि को दूर करके पुन. आतो को घी से चिकना करके पूर्व की भांति रख देवे ॥१८३-१८५॥ मूर्छनाद्यच्च संमूढमन्त्रं तच्च विमोक्षयेन् । आत के सम्मूर्छन (मिलने) से जो बद्धगुदोदर उत्पन्न हुआ हो उसमे मल या चिकास को हटा कर घी से चिकना करके पृथक् करना चाहिये । बाह्य व्रण को सी देना चाहिये । छिद्राण्यन्त्रस्य तु स्थूलर्दंशयित्वा पिपीलिकैः ॥ १८६ ॥ बहुशः संगृहीतानि ज्ञात्वा छित्वा पिपीलिकान् । प्रतियोगैः प्रवेश्यान्त्रं प्रयैः सीव्येद् व्रणं ततः ॥ १८७ ॥
५४४ चरकसंहिता [ अ० १३ छिद्रोदर मे छिद्रयुक्त आतो को निकाल कर इनकी परीक्षा करके शर्करादि को हटा कर, अन्त स्त्राव का शोधन करके, छिद्रयुक्त स्थान पर बड़ी-बड़ी चिऊटियो से कटवाना चाहिये । इनके काटने से जगह मिल जायेगी । जिस समय अच्छी प्रकार से चिऊटिया काट ल ता उनका काट कर बाहर निकाल देना चाहिये । इनके शिर को वहा लगा रहने देना चाहिये । फिर आतो को यथास्थान रख कर कुक्षि के बाह्य व्रण को सूई से सी देना चाहिये। [ चिउटियो या मकाडो को काटने का प्रकार यह है कि आत का जो भाग चिरा हो उसके चर्म भागो को एक साथ निउटी के खुले चिमटो मे पकड़ादे और चिउटी का धड काट दे, शिर भाग वहा ही चिपटा रहेगा १ ] ॥१८६-१८७॥ तथा जातोदकं सर्वमुदरं व्यधयेद्भिषक् । वामपार्श्वे त्वधो नाभेनार्डी दत्त्वा च गालयेत् ॥ १८८ ॥ निःस्त्राव्य च विमृज्येतद्वेष्टयेद्वाससोदरम् । तथा बस्तिविरेकाद्यैर्म्लानं सर्वं च वेष्टयेत् ॥ १८९ ॥ पेट मे पानी भरने पर व्रण का वेधन करना चाहिये । इसके लिये नाभि से नीचे वाम भाग मे चार अगुल स्थान छोड़ कर वधन करना चाहिये । फिर नाड़ी लगा कर सब दोषदक का निकाल लेना चाहिये । उदर को मल कर सब पानी निकाल लेना चाहिय, फिर नाड़ी को निकाल कर उदर को मजबूत वस्त्र से बाध देना चाहिये । इसी प्रकार बस्ति या विरेचन आदि दोष निःसारक कार्य से म्लान हुए रोगी के उदर को वस्त्र से बाध देना चाहिये, इससे वायु अफारा नही करती ॥ १८८-१८६ ॥ निःस्रुते लङ्घितः पेयामस्नेहलवणा पिबेत् । अतः परं च षण्मासान् क्षीरवृत्तिर्भवेन्नरः ॥ १९० ॥ त्रीन् मासान् पयसा पेयां पिबेत्त्रींश्चापि भोजयेत् । १ सुश्रुत मे विस्तार से विधि दी है यथा— बद्धगुदे परिस्राविणि च स्निग्धस्विन्नाभ्यक्तस्याधोनाभेर्वामतश्चतुरङ्गुलमपहाय रोमराज्या उदर पाटयित्वा चतुरङ्गुलप्रमाणान्यन्त्राणि निष्कृष्य निरीक्ष्य बद्ध- गुदस्य अन्नप्रतिरोधकरमश्मान वाल वाऽपोह्य मलजात वा ततो मधुसर्पिर्भ्यामभ्य- ज्यान्त्राणि यथास्थान स्थापयित्वा बाह्य व्रणमुदरस्य सीव्येत् ॥ परिस्राविण्यप्येव- मेव शल्यमुद्धृत्यान्त्रस्त्रावान् संशोध्य सच्छिद्रमन्त्र समाधाय कालपिपीलिकाभिर्दश- येत् । दष्टे च तासा कायानपहरेत् न शिरांसि। ततः पूर्ववत् सीव्येत् ॥सु०चि०१४॥
अ० १३ ] ३५ चिकित्सितस्थानम् ५४५
अ० १३ ] ३५ चिकित्सितस्थानम् ५४५ श्यामाकं कोरदूषं वा पयसाऽलवणं नरः¹ ॥ १६१ ॥ संवत्सरेणैव जयेत् प्राप्तं चैव जलोदरम् । प्रयोगाणां च सर्वेषामनुक्षीरं प्रयोजयेत् ॥ १६२ ॥ पानी के निकल जाने पर रोगी को लङ्घन कराके स्नेह और लवण से रहित पेया पिलानी चाहिये । इसके पीछे छः मास तक केवल दूध पर ही निर्वाह करे। तीन मास तक दूध के साथ पेया पीना चाहिये । शेष तीन मासो मे श्यामाक, कोदो आदि लघु अन्न दूध के साथ, थोडे नमक के साथ खाये । इस प्रकार से एक साल की चिकित्सा से जलोदर की चिकित्सा करनी चाहिये² ॥१६०-१६२॥ दोषानुबन्धरक्षार्थं बलस्थैर्यार्थमेव च प्रयोगापचिताङ्गानां हितं ह्युदरिणां पयः । सर्वधातुक्षयार्तानां देवानाममृतं यथा ॥ १६३ ॥ दोष-अनुबन्ध की निवृत्ति और बल तथा धातुओ की स्थिरता के लिये सब प्रयोगो के पीछे दूध पीना चाहिये । क्योंकि विरेचनादि प्रयोगों से क्षीण अंगों वाले और सब धातुओं का क्षय होने से उदर-रोगी के लिये दूध अमृत के समान हितकारी है ॥ १६३ ॥ तत्र श्लोकौ—हेतुं प्राग्रूपमष्टानां लिङ्गं व्याससमासतः । उपद्रवान् गरीयस्त्वं साध्यासाध्यत्वमेव च ॥ १६४ ॥ जाताजाताम्बुलिङ्गानि चिकित्सा चोक्तवानृषिः । समासव्यासनिर्देशैरुदराणां चिकित्सिते ॥ १६५ ॥ उपसहार—आठो प्रकार के उदर रोगा के विस्तार और सक्षेप मे कारणों, पूर्वरूपो, लक्षणो और उपद्रवो तथा प्राधान्य-अप्राधान्य, साध्यासाध्य, जातोदक और अजातोदक के लक्षण और चिकित्सा का भगवान् आत्रेय ने इस उदररोग- चिकित्सा-अध्याय मे कह दिया ॥ १६४-१६५ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने उदर- चिकित्सितं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ १. 'कोरदूष्यं वा क्षीरेण लघुभोजन' इति च पाठः । २. सुश्रुत मे— २. निःस्रुते च दोषे गाढतरमाविककौशेयकचर्मणामन्यतमेन परिवेष्टयेदुदरम्। तथा नाध्मापयति वायु । षण्मासांश्च पयसा भोजयेत् जांगलरसेन वा । तत्र त्रीन् मासान् अर्द्धोदकेन पयसा फलाम्लेन जांगलरसेन वा । अवशिष्टमासत्रयमन्नं लघु हितं वा सेवेत । एव संवत्सरेणागदो भवति ॥ सु० चि० १४ ॥
५४६ चरकसंहिता [ अ० १४ चतुर्दशोऽध्यायः। अथार्शश्चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे अर्शारोग चिकित्सा की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है¹ ॥ १-२ ॥ आसीनं मुनिमव्यग्रं कृतजप्यं कृतक्षणम् । पृष्टवानर्शसां मुक्तिमग्निवेशः पुनर्वसुम् ॥ ३ ॥ प्रकोपह्तुसंस्थानं स्थानं लिङ्गचिकित्सितम् । साध्यासाध्यविभागं च तस्मै तन्मुनिरब्रवीत् ॥ ४ ॥ मन्त्र आदि जप करके स्वस्थ रूप मे बैठे हुए भगवान् आत्रेय से अवसर देखकर अग्निवेश ने अर्श-रोग से छूटने का उपाय पूछा । आत्रेय मुनि ने अग्निवेश को अर्श रोग के प्रकोपके कारण, आकृति, उत्पत्ति, स्थान, लक्षण, चिकित्सा और साध्य-असाध्य भेदो का उपदेश किया ॥३-४॥ इह खल्वग्निवेश ! द्विविधान्यर्शांसि सहजानि कानिचित् कानि- चिज्जातस्योत्तरकालजानि । तत्र बीजं गुदवलिबीजोपतप्तमायतनमर्शसा सहजानाम् । तत्र द्विविधौ बीजावुपतप्तौ हेतुर्मातापित्रोरपचारः, पूर्वकृतं च कर्म, तथाऽन्येषामपि सहजाना विकाराणाम् । तत्र सहजानि सह- जातानि शरीरेण, अर्शांसीत्यधिमांसविकाराः ॥ ५ ॥ हे अग्निवेश ! अर्श-रोग दो प्रकार के होते है । कई अर्श सहज अर्थात् गर्भ-शरीर के साथ उत्पन्न होते है, और कई अर्श उत्पत्ति काल के पीछे उत्पन्न हो जाते हैं । इनमे गुदवलि के आरम्भक बीजभाग के उपतप्त ( दूषित ) होने से सहज अर्श उत्पन्न होते है । शुक्र और आर्त्तव के उपतप्त ( दूषित होने से ) अर्श होते है । शुक्र-आर्त्तव रूपी बीज के उपतप्त ( दूषित ) होने के दो कारण हैं । एक—माता पिता का अनुचित आहार-विहार और दूसरा-पूर्वकृत कर्म । १ कुछ लोगों की धारणा है कि यहा से आरम्भ करके अन्त तक के भाग को आचार्य दृढबल ने पूरा किया है । जैसा कि कहा जाता है— 'अखण्डार्थं दृढबलो जातः पञ्चनदे पुरे । कृत्वा बहुभ्यः शास्त्रेभ्यो विशेषाच्च बलोच्चयम् । सप्तदशौषधाध्यायसिद्धकल्पैरपूरयत् ॥'
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५४७
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५४७ इसी प्रकार से अन्य सहज रोगो के भी ये ही दो कारण है। इनमे गर्भ-शरीर के साथ उत्पन्न सहज-अर्श अधिमास के ही विकार हैं। इनको अधिमास विकार ही समझना चाहिये । [ किसी स्थान पर अधिक मास का उठ आना 'अधिमास' विकार कहाता है, यह भी एक प्रकार का रोग है ] ॥५॥ सर्वेषां चार्शसां क्षेत्रं—गुदस्यार्धपञ्चमाङ्गुलेऽवकाशे त्रिभागान्त- रास्तिस्रो गुदवलयः, क्षेत्रमिति देशः। स्थान—दानो प्रकार के अशों का स्थान गुदा के मुख से लेकर साढे पाच अगुल गुदाभाग है। इस गुदा भाग के तीन विभाग है। इसमे तीन वलिया (चक्र) है। (१) प्रवाहिणी, (२) विसर्जनी और (३) सवरणी १। ये तीनो वलिया दोनो प्रकार के अर्श रोगो का उत्पत्ति स्थान है। [ ये वली या चक्र डेढ २ अगुल चौड़ी ओर एक अगुल उभार की चार अगुल भर हाती हैं ।] केचित्तु भूयांसमेव देशमुपदिशन्त्यर्शसां शिश्ममपत्यपथं गलमुख- नासिकाकर्णाक्षिवर्त्मानि त्वक् च। कई आचार्य इससे भी अधिक स्थानों को अर्श का स्थान मानते है। जैसे—अपत्य-पथ (योनिमार्ग) लिग (इन्द्रिय), गला, तालु, मुख, नाक, कान, आख इनके मार्ग और त्वचा इन स्थानो मे भी अर्शरोग होता है। तदस्रत्यधिमांसदेशतया, गुदवलिजाना त्वर्शासीति संज्ञा तन्त्रेऽस्मिन् । सर्वेषा चार्शसामधिष्ठानं मेदो मांसं त्वक् च ॥ ६ ॥ ये सब स्थान अधिमास के रोग है, इस शास्त्र मे गुदा की वलियो मे उत्पन्न अशो की ही 'अर्श' सज्ञा है। सब प्रकार के अर्श-रोगो का आश्रय-स्थान मेद मास और त्वचा है ॥ ६॥ तत्र सहजान्यर्शांसि कानिचिदणूनि कानिचिन्महान्ति कानिचिद्दी- र्घाणि कानिचिद् ह्रस्वानि कानिचिद् वृत्तानि कानिचिद्विषमविस्तृतानि कानिचिदन्तःकुटिलानि कानिचिद् बहिःकुटिलानि कानिचिज्जटिलानि कानिचिदन्तर्मुखानि यथास्वं दोषानुबन्धवर्णानि ॥ ७ ॥ सहज अर्श—कोई तो अति सूक्ष्म, कोई बड़े, कोई लम्बे, कोई छोटे, कोई गोल, कोई विषम रूप मे, फैले, कोई अन्दर से टेढे, कोई बाहर से टेढे, कोई जटिल (गुथे हुए), कोई अन्दर की ओर मुख किये हुए तथा दोषानुसार वर्ण वाले होते है ॥ ७ ॥ १ सुश्रुत मे कहा है—तत्र स्थूलान्त्रप्रतिविद्धमर्धपंचामुल गुदमाहुः। तस्मि- न्वलयस्तिस्रः, अध्यर्धांगुलसम्मितः । प्रवाहिणी, विसर्जनी, संवरणी चेति । चतुरंगुलमिताः सर्वास्तिर्यगेकागुलोच्छ्रिताः। सु० नि० २।
५४८ चरकसंहिता [ अ० १४ तैरुपहतो जन्मप्रभृति भवत्यतिकृशो विवर्णः क्षामो दीनः प्रचुरवि- बद्ध-वात-मूत्र-पुरीषः शार्करी चाश्मरी वा तथाऽनियत-वि बद्ध-मुक्त-पक्वा- मश्रुष्कभिन्नवर्चा अन्तगान्तरा श्वेत-पाण्डु-हरित-पीत-रक्तारुण-तनु-सान्द्र- पिच्छिल-कुणप-गन्धाम-पुरीषोपवेशी नाभि-बस्ति-वङ्क्षणोद्देशे प्रचुरपरि- कतिकान्वितः सशूलगुदप्रवाहिकः परिहर्ष-प्रमोह-प्रसक्त-विष्टम्भान्त्र-कूजो- दावर्त्त-हृदयेन्द्रियोपलेपः प्रचुरविवद्धतिक्ताम्लोद्गारः सुदुर्बलो सुदुर्बला- ग्निरल्पशुक्रः क्रोधनो दुःखोपचारशीलः काश-श्वास-तमक-तृष्णा-हृल्लास- च्छर्दिररोचकाविपाक-पीनस-क्षवथु-पर्वांतरतैर्मिरिकः शिरःशूली क्षाम- भिन्न-सन्न-सक्त-जर्जर-स्वरः कर्णरोगी सशूल-पाणि-पाद-वदनाक्षि-कूटः सज्वरः साङ्गमर्दः सर्वपर्वास्थिशूली चान्तरान्तरा पार्श्व-कुक्षि-बस्ति- हृदय-पृष्ठ-त्रिक-ग्रहोपतप्तः प्रध्यानपरः परमालसश्चेति । जन्मप्रभृत्यस्य गुदजेरावृतो मार्गोपरोधाद्वायुरपानः प्रत्यारोहन्समानव्यानप्राणोदानान् पित्तश्लेष्माणो च प्रकोपयति, ते प्रकुपिताः पञ्च वाताः पित्तश्लेष्माणौ चार्संसमभिद्रवन्त एतान् विकारानुपजनयन्तीत्युक्तानि सहजा- न्यर्शांसि ॥ ८ ॥ लक्षण—अर्शरोग के कारण रोगी जन्म से ही अति कृश, विवर्ण ( कान्ति- रहित ), क्षीण, दीन होता हं । वायु, मूत्र और मल की अधिकता ओर रुकावट रहती है । अश्मरी ( पथरी ) तथा मूत्र मे शर्करा ( रेत ) रोग की शिकायत होती है । अनिश्चित रूप मे बधा, ढीला, कच्चा, पका, शुष्क या पतला मल आता है । बीच-बीच मे कभी कभी श्वेत, पीला, हरा, धूसर वर्ण, लाल, अरुण, पतला, गाढ़ा, चिकना, शव के समान गन्धयुक्त, कच्चा मल त्याग करता है । नाभि, बस्ति और वक्षण ( कोख ) प्रदेश मे काटने के समान वेदना होती है । गुदा मे शूल, प्रवाहिका, परिहर्ष ( रोमांच ) प्रमोह रहता है । निरन्तर विष्टम्भ ( अवरोध, वायु का ), आटोप ( वेदनायुक्त गुड़गुड़ शब्द ), आंतो मे कूजन, उदावर्त्त, हृदय और इन्द्रियों का उपलेप ( कार्यों मे असमर्थता ) रहती है । उद्गार ( डकार ) बहुत, विबद्ध, तिक्त और अम्ल आता है । निर्बल, मन्दाग्नि, अल्पशुक्र, क्रोधी, निरन्तर दुःखी, कास, श्वास, तमक श्वास, प्यास, जी- मचलाना, वमन, अरुचि, अविपाक, पीनस, छीक इन रोगों से युक्त, तिमिर नामक नेत्ररोग से पीड़ित, शिरःशूलयुक्त हाता है । इसका स्वर निर्बल फटा तथा जर्जरित रहता है । कर्ण रोग होते है । हाथ, पाव, मुख और आखों के गोलकों पर सूजन होती है । ज्वर, अंगों का टूटना, पर्व अस्थियो मे शूल रहता है । बीच-बीच मे पार्श्वशूल, कुक्षिशूल, बस्तिशूल, हृदयशूल, पृष्ठशूल,
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५४६
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५४६ त्रिकशूल या इनका जकड़ाव हो जाता है। रोगी निरन्तर चिन्ताशील और अत्यन्त आलसी होता है । जन्मकाल से ही लेकर गुदा-मार्ग के बन्द होने के कारण अपानवायु ऊपर की ओर आकर समान वायु, प्राण वायु, व्यान वायु, उदान वायु तथा पित्त ओर कफ को प्रकुपित कर देती है। ये पाचो वायुए तथा पित्त और कफ कुपित होकर अर्श-रोगी मे वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य रोगो को उत्पन्न करने है । इस प्रकार से सहज अर्शों का वर्णन किया जा चुका है ॥ ८ ॥ अत ऊर्ध्वं जातस्योत्तरकालजानि व्याख्यास्यामः ॥ ६ ॥ इसके आगे बालक की उत्पत्ति के पीछे होने वाले अर्श रोग की व्याख्या करते है ॥ ॥ ६ ॥ गुरु-मधुर-शीताभिष्यन्दि-विदाहि-विरुद्धाजीर्ण-प्रमिताशनासात्म्य- भोजनाद् गव्य-मात्स्य-कुक्कुट-वाराह-माहिषाजाविक-पिशित-भक्षणात् कृश-शुष्क-पूतिमास-पैष्टिक-परमान्न-क्षीर-मन्दक-दधि-तिल-गुड-विकृति- सेवनाच्च माप-यूषेशु-रस-पिण्याक-पिण्डालुक-शुष्क-शाक-शुक्त-लशुन-- किलाट-पिण्डक-बिस-मृणाल-शालूक-क्रौञ्चादन-कशेरुक-शृङ्गाटक-तरुण- विरूढ-नवधान्याममूलकोपयोगाद् गुरु-फल-शाक-राग-हरितक-मर्दक- वसा-शिरस्पंद-पर्युषित-पूति-शीत -संकीर्णान्नाभ्यवहरणान्मन्दक्रा तिकक्रान्त- मद्य-पानाद् व्यापन्न-गुरु-सलिल-पानादतिस्नेह-पानादसंशोधनाद्वस्तिकर्म- विभ्रमादव्यवायाद्दिवास्वप्नात्सुखशयनासनोपसेवनाच्चोपहताग्नेर्मलोपच- यो भवत्यतिमात्रम् । गुरु, मधुर, शीतल, अभिष्यन्दी, विदाही, विरुद्ध, अजीर्ण, प्रमिताशन, ( एक रस के भोजन से ), असात्म्य भोजन के कारण, गाय, मत्स्य, कुक्कुट, वराह (शूकर ), महिष ( भैसा ), बकरी, भेड इन पशुओ के मास के भक्षण से, कृश और शुष्क प्राणी का मास खाने से, सडे, दुर्गन्धयुक्त मास से, पिष्ठी से बने अन्न का, परमान्न को, दूध, दही, दधिमण्ड, तिल, गुड से बने पदाथौ के सेवन से, उडद, गन्न के रस, पिण्याक ( खल ), पिण्डालु ( कचालु ), शुष्क शाक, शुक्त, लहसुन, किलाट ( फटा हुआ दूध ), तक्रपिण्डक ( तक्र कूर्चिका अथवा तक्र का घना भाग ), बिस, मृणाल, शालूक ( कन्द ), क्रोञ्चा- दन, कसेरू, सिंघाडा, तरुण ( कच्चे ), अविरूढ ( अंकुरित ), नव ( नये ) शूक-धान्य, शमी-धान्यो के सेवन से, कच्ची मूली के खाने से, गुरु फल, गुरु- शाक के खाने से, राग ( रायता षाडव ), हरित ( आर्द्रक आदि ), करमर्द, वसा, शिरस्पद, पर्युषित (बासी), पूति (दुर्गन्धयुक्त), शीतल, सकीर्ण
५५० चरकसंहिता [ अ० १४ (नाना द्रव्य से मिलकर बना मिश्र-प्रकृतिक), अन्न के प्रयोग करने से, मन्दक दधि, अतिक्रान्त (व्यापन्न, दूषित) मद्य के पान करने से, दूषित और भारी पानी के पीने से, अति स्नेहपान से, शरीर शुद्धि न करने से, बस्तिकर्म के मिथ्यायोग से, मैथुन के सर्वथा अभाव से, दिन मे सोने से, सुखकारक शय्या, आसन और स्थान के सेवन से, मन्द अग्निवाले पुरुष मे मल की वृद्धि अति मात्रा मे होती है ॥ तथोत्कटुक-विषम-कठिनासन-सेवनादुद्भ्रान्तयानोष्ट्रयानादतिव्य- वायाद्बस्तिनेत्रासम्यक्प्रणिधानाद् गुदक्षणनादभीक्ष्णं शीताम्बुसंस्पर्शा- च्चेलोष्टतृणादि घर्षणात्प्रततातिनिर्बहणाद् वातमूत्रपुरीषवेगोदीरणात्स- मुद्तीर्णवेगविनिग्रहात्स्त्रीणा चाऽऽमगर्भभ्रंशाद् गर्भोत्पीडनाद् बहुविषम- प्रसूतिभिश्च प्रकुपितो वायुरपानस्तं मलमुपचितमधोगममासाद्य गुद- वलिष्वाधत्ते, ततस्तास्वर्शांसि प्रादुर्भवन्ति ॥ १० ॥ इसी प्रकार से उत्कट आसन, विषम या कठिन आसन के सेवन से, विक्षो- भकारक पान से, ऊँट की सवारी से, अतिमैथुन से, बस्ति-नेत्र के मिथ्यायोग से, गुदा मे क्षत होने से, ठण्डे पानी के स्पर्श से, वस्त्र, ढेला, तिनके आदि से घसड़ लगने पर, निरन्तर वेगपूर्वक प्रवाहण से, अनुपस्थित वायु, मूत्र, मल को जोर से प्रवाहण करने से, उपस्थित मल मूत्र के वेगो को रोकने से, स्त्रियो मे आम-गर्भ के गिरने से, प्रवृद्ध गर्भ द्वारा उत्पीडन होने से, विषम प्रसूति (अकाल- प्रसव) से, प्रकुपित अपानवायु अधोगत मल (दोष) को गुदवलियो मे एक त्रत कर देते है। इससे गुदवलियो मे अर्श उत्पन्न हो जाते है ॥१०॥ सर्षप-मसूर-माष-मुद्ग-कुष्ठक-यव-कलाय-पिण्डि-टिण्टिकेर-खर्जूर-कर्क- न्धु-काकणन्तिका-बिम्बी-बदर-करीरोदुम्बर-जाम्बव-गोस्तनाङ्गुष्ठ-कशेरु- क-शृङ्गाटक-शृङ्गी-दक्ष-शिखि-शुकतुण्ड-जिह्वा-पद्ममुकुल-कर्णिका-संस्था- नानि सामान्याद्वातपित्तकफप्रबलानि ॥११॥ उत्पत्ति के पीछे उत्पन्न होने वाले वात, पित्त और कफजन्य तथा द्वन्द्वज अर्श सामान्यरूप से—सरसो, मसूर, उड़द, मोठ, जौ, मटर, पिण्ड (पिण्डा- कार), टिण्टिकेर (टेटु), केवुक, तिन्दुक, काकणन्तिका (काकदन्तिका, रत्ती), कर्कन्धु (बेर), कदर (श्वेत खदिर), बिम्बी फल, करीर, गूलर, खजूर, जामुन, गाय के स्तन, अगूठा, कशेरू, सिंघाड़ा, कुक्कुट, मोर, तोते की चोच के समान तथा जीभ की भाति, कमल के डोडे के समान और कर्णिका (पद्मकर्णिका) के समान आकार के अर्श होते है ॥११॥
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५५१
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५५१ तेषामयं विशेषः- शुष्क-म्लान-कठिन-परुष-रूक्ष-श्यावानि तीक्ष्णा- ग्राणि वक्राणि स्फुटितमुखानि विषमविस्तृतानि शूलाक्षेप-तोद-स्फुरण- चिमिचिमासंहर्षणापरीतानि स्निग्धोष्णोपशमानि प्रवाहिकाध्मान-शिश्न- वृषण-बस्ति-वङ्क्षण-हृद्ग्रहाङ्गमर्द-हृदय-द्रव-प्रबलानि प्रतत-विबद्ध-वात- मूत्र-वर्चासि कठिन-वर्चस्यूरु-कटी-पृष्ठ-त्रिक-पार्श्व-कुक्षि-बस्ति-शूल-शिरो- ऽभिताप-क्षवथूद्गार-प्रतिश्याय-कासोदावर्तायास-शोष-शोथ-मूर्च्छारो- चक-मुखवैरस्य-तैमिर्य-कण्डू-नासा-कर्ण-शङ्ख-शूल-स्वरोपघात-कराणि श्यावारुण-परुष-नख-नयन-वदन-त्वङ्-मूत्र-पुरीषस्य वातोल्बणान्यर्शां- सीति विद्यात् ॥१२॥ इन वातादिजन्य अर्शो की विशेषता यह है—जो अर्श शुष्क, म्लान ( मुरझाये ), कठिन, परुष ( कर्कश ), रूक्ष, श्याव वर्ण के हो, आगे से तीक्ष्ण, टेढे, फटे ( विदीर्ण ) मुख वाले, विषम रूप मे फैले हो, जिनमे शूल, आक्षेप, भेदन, स्फुरण, चिमिचिमायन ( सरसो या राई के लेप के समान वेदना ) और सहर्ष ( खाज ) होती हो, स्निग्ध ओर उष्ण उपचार से शान्त हो जाये, प्रवा- हिका, आध्मान, शिश्नग्रह ( रोगी लिग का खींचे, या पकड़े ), वृषण-ग्रह, बस्ति- ग्रह, वक्षण-ग्रह, हृदय-ग्रह ( इनका जकड़ जाना या इनमे वेदना होना ), अगों का टूटना, हृदय का जल्दी-जल्दी चलना, वायु, मल, मूत्र का सदा अवरोध रहना, जाघ, कटि, पीठ, पार्श्व, कुक्षि तथा बस्ति मे शूल रहना, शिरोवेदना, छीक आना, उद्गार-प्रवृत्ति, प्रतिश्याय, कास, उदावर्त्त, आयाम ( वात रोग ) शोष, शोथ, मूर्च्छा, अरुचि, मुख की विरसता, तैमिर्य ( तिमिर नामक नेत्र रोग ), नासिका मे खाज, कर्णशूल, शखशूल, स्वरभेद, त्वचा, नख, आखे, मुख, मल और मूत्र का श्याव या अरुण ( नीला या लाल ) वर्ण, इनमे कठोरता का होना वात प्रधान अर्शो के लक्षण है ॥१२॥ भवतश्चात्र—कषायकटुतिक्तानि रूक्षशीतलघूनि च। प्रमिताल्पाशनं तीक्ष्णमद्यमैथुनसेवनम् ॥ १३ ॥ लङ्घनं देशकालौ च शीतौ व्यायामकर्म च । शोको वातातपस्पर्शो हेतुर्वातार्शसामिति ॥ १४ ॥ वातजन्य-अर्श के कारण—कषाय, कटु, तिक्त, रूक्ष, लघु और शीतल प्रमित ( एक ही रस का सेवन ) और अल्प भोजन करने से, तीक्ष्ण मद्य से, मैथुन से, उपवास से, शीत देश मे वास वा शीत काल से, व्यायाम से, शोक से, वायु, धूप के स्पर्श से वातजन्य-अर्श उत्पन्न होते है ॥१३-१४॥
५५२ चरकसंहिता [ अ० १४ तत्र यानि मृदु-शिथिल-सुकुमाराणि स्पर्शासहानि रक्त-पीत-नील- कृष्णानि स्वेदोपक्लेदबहुलानि विस्रगन्धीनि तनु-पीत-रक्त-स्रावीणि दाह- कण्डू-शूल-निस्तोद-पाकवन्ति शिशिरोपशयानि संभिन्नपीतहरितवर्चांसि पीत-विस्रगन्ध-प्रचुर-विण्मूत्राणि पिपासाज्वरतमकसंमोहभोजनद्वेषकरा- णि पीत-नख-नयन-त्वङ्-मूत्र-पुरीषस्य पित्तोल्बणान्यर्शांसीति विद्यात् १५॥ पित्तप्रधान-अर्शों के लक्षण—जो अर्श कोमल, शिथिल, सुकुमार, स्पर्श को न सहन करने वाले, लाल, पीले, नीले, काले जिनमें पसीना और क्लिन्नता बहुत रहती हो, जिनसे सड़ी, आम गन्ध आती हो, पतला, पीला रक्त जिनसे बहता हो, रक्तस्राव होता हो, जिनमें जलन, कण्डू ( खाज ), शूल, तोद, वेदना तथा पाक हो, जो शीत क्रिया से शान्त हो जाये, जिनमें पतला ( भिन्न ), पीला, हरा मल आता हो, जिनमें मल मूत्र पीले वर्ण तथा बुरी गन्ध का और मात्रा मे बहुत हो, रोगी को प्यास, ज्वर, तमक, श्वास, संमोह ( मूर्च्छा ) तथा भोजन से द्वेष रहता हो, नख, आखे, त्वचा, मल, मूत्र पीले हों तो पित्तप्रधान-अर्शों को समझना चाहिये ॥ १५ ॥ भवतश्चात्र—कट्वम्ललवणक्षारव्यायामाग्न्यातपप्रभाः । देशकालावशिशिरौ क्रोधो मद्यमसूयनम् ॥ १६ ॥ विदाहि तीक्ष्णमुष्णं च सर्वपानान्नभेषजम् । पित्तोल्बणानां विज्ञेयः प्रकोपे हेतुरर्शसाम् ॥ १७ ॥ कारण—कटु, अम्ल, लवण, क्षार, व्यायाम, अग्नि, धूप, और प्रभा ( ज्योति ), उष्ण देश, उष्ण काल, क्रोध का आना, मद्य, असूया (परनिन्दा), विदाही, तीक्ष्ण और उष्ण प्रकृति का सब खानपान, पित्तप्रधान-अर्शो का प्रकोपक कारण है ॥ १६-१७-॥ तत्र यानि प्रमाणवन्त्युपचितानि श्लक्ष्णानि स्पर्शासहानि श्वेतपाण्डु- पिच्छिलानि स्तब्धानि गुरूणि स्तिमितानि सुप्तसुप्तानि स्थिरश्वयथूनि कण्डूबहुलानि प्रतत-पिञ्जर-श्वेत-रक्त-पिच्छलास्रावीणि गुरु-पिच्छिल-श्वेत- मूत्र-पुरीषाणि रूक्षोष्णोपशयानि प्रवाहिकातिमात्रोत्थानवड्क्षणाहव- न्ति परिकर्तिका-हल्लास-निष्ठिविका-कासारोचक-प्रतिश्याय-गौरव-च्छर्दि- मूत्र-कृच्छ्र-शोष-शोथ-पाण्डु-रोग-शीत-ज्वराश्मरी-शर्करा-हृदयेन्द्रियास्यो- पलेपास्यमाधुर्य-प्रमेह-कराणि दीर्घकालानुपशयान्यतिमात्रमग्नि-मार्दव- क्लैब्य-कराण्याम-विकार-प्रबलानि गुरूणि च शुक्ल-नख-नयन-वदन-त्वङ्- मूत्र-पुरीषस्य श्लेष्मोल्बणार्शांसीति विद्यात् ॥ १८ ॥
अ० १४ । चिकित्सितस्थानम् ५५३
अ० १४ । चिकित्सितस्थानम् ५५३ कफप्रधान-अर्शों के लक्षण—जो अर्श बहुत बडे प्रमाण के ( बढे हुए ), चिकने, स्पर्श को सहने वाले, स्निग्ध, श्वेत, पाण्डु और चिक्कन ( पिच्छिल ), स्तब्ध ( जड़ी भूत ), भारी, स्तिमित ( गीले वस्त्र से ढपे हुए के समान ), अति सुप्त ( स्पर्श ज्ञान से रहित ), स्थिर, शाथयुक्त जिनमे बहुत खाज हो, जिनमे स्राव मात्रा मे अधिक तथा निरन्तर आये, स्राव, धूमर, श्वेत, लाल, शुक्र, पिच्छा ( सीम्बल के गाद के समान ) जैसा हो, मल और मूत्र, भारी, पिच्छिल और श्वेतवर्ण हो, रुक्ष और उष्णक्रिया से जिनमे शान्ति होती हो, प्रवाहिका बार-बार उठ कर बैठना ( थोडा मल बाहर आये ), वक्षणो मे आनाह हो, परिकर्त्तिका, जी मचलाना, निष्ठीवन ( थूक का आना ), कास, अरुचि, प्रतिश्याय, भारीपन, छर्दि, मूत्रकृच्छ्र, शोष, शोथ, पाण्डुरोग, शीत ज्वर, अश्मरी, शर्करा, हृदय-उपलेप, इन्द्रिय उपलेप ( कफाधिकता ), मुख मे मधुर रस, प्रमेह-रोग का होना, दीर्घ काल तक रहने वाली अग्नि की अति- मन्दता, क्लीबता को करने वाले, आमजन्य प्रा उठ रोगो को पैदा करने वाले, नख, नयन, मुख, त्वचा, मूत्र और मल का वर्ण श्वेत होता है, इन अर्शों को कफप्रधान-अर्श समझना चाहिये ॥ १८ ॥ भवन्ति चात्र-मधुरस्निग्धशीतानि लवणाम्लगुरूणि च । अव्यायामो दिवास्वप्नः शय्यासनसुखे रतिः ॥ १६ ॥ प्राग्वातसेवा शीतो च देशकालावचिन्तनम् । श्लैष्मिकाणां समुद्दिष्टमेतत्कारणमर्शसाम् ॥ २० ॥ कारण—मधुर, स्निग्ध, शीतल, लवण, अम्ल, गुरु भोजनो के सेवन से, व्यायाम न करने से, दिन मे सोने से, शय्या-सुख, आसन-सुख की प्रवृत्ति, जोर की सीधी वायु का सेवन, शीतल देश, शीतल काल, चिन्ता न करना ये कफजन्य अर्शरोग के कारण है ॥ १६-२० ॥ हेतुलक्षणसंसर्गाद्विद्याद् द्वन्द्वोल्बणानि च । सर्वो हेतुस्त्रिदोषाणां सहजैर्लक्षणं समम्१ ॥ २१ ॥ उपरोक्त दो कारण ओर लक्षणो के मिलने से द्वन्द्वज-अर्श ( वात, पित्तो- ल्बण, वात, श्लेष्मोल्बण, पित्तश्लेष्मोल्बण ) उत्पन्न होते है । तीनों दोषो के मिलने से सन्निपातजन्य अर्श-रोग उत्पन्न होते है, इसके लक्षण सहज ( गर्भ शरीर के साथ उत्पन्न ) अर्श के समान होते है ॥ २१ ॥ १ 'लक्षणैः समम्' इति वा पाठः ।