चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 520, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें५३६ चरकसंहिता [ अ० १३ (५) नीलिन्याद्य-चूर्ण—नीलिनी, निचुल (जलवेतस), सर्जक्षार और यवक्षार, सैन्धव, सामुद्र, विड्, सवल और उद्भिद्, चित्रक ये सब समान भाग लेकर चूर्ण कर लेने चाहिये । इस चूर्ण को घी के साथ पीने से उदर और गुल्म-रोग शान्त होते हैं ॥ १३६-॥ क्षीरद्रोणं सुधाक्षीरप्रस्थार्धसहितं दधि ॥ १३७ ॥ जातं विमथ्य तद्युक्त्या त्रिवृत्सिद्धं पिबेद् घृतम् । तथा सिद्धं घृतप्रस्थं पयस्यष्टगुणे पिबेत् ॥ १३८ ॥ (६) स्नुही क्षीर—दूध एक द्रोण (चार आढक), स्नुही (थोर) का दूध आधा प्रस्थ (८ पल) मिला कर दही जमानी चाहिये । इस दही का मथ कर घी निकालना चाहिये । फिर त्रिवृत् का कल्क चौथाई भाग और जल चार भाग और यह तैयार घृत १ भाग लेकर घृत सिद्ध करना चाहिये । इस घी का उचित मात्रा में पीना चाहिये ॥ १३७-१३८ ॥ स्नुक्क्षीरपलकल्केन त्रिवृता षट्पलेन च । गुल्मानां गरदोषाणामुदराणां च शान्तये ॥ १३९ ॥ इति स्नुहीक्षीरघृतम् । (७) उपरोक्त सुधाक्षीर-विधि से बनाये घृत को, आठ गुणे दूध में, थोर का दूध १ पल और निशोथ का चूर्ण ६ पल इनके कल्क के साथ सिद्ध करके पीना चाहिये ॥ १३९ ॥ दधिमण्डाढके सिद्धात्स्नुक्क्षीरपलकल्कितान् । घृतप्रस्थात्पिबेन्मात्रां तद्गज्जठरशान्तये ॥ १४० ॥ (८) दधि मण्ड (दही का मस्तु) १ आढक, स्नुही का दूध १ पल, घृत १ प्रस्थ इनको यथाविधि पाक करके कोष्ठापेक्षी मात्रा में पीने से उदर-रोग शान्त होते हैं ॥ १४० एषां चानुपिबेत्पेयां पयो वा स्वादु वा रसम् । घृते जीर्णे विरिक्तस्तु कोष्णं १ नागरकैः शृतम् ॥ १४१ ॥ पिबेदम्बु ततः २ पेयां यूषं कोलत्थकं ततः । पिबेद् रूक्षस्त्र्यहं त्वेवं पयोऽन्नं ३ प्रतिभोजितः ॥ १४२ ॥ पुनः पुनः पिबेत्सर्पिरानुपूर्व्या तथैव च । घृतान्येतानि सिद्धानि विदध्यात्कुशलो भिषक् ॥ १४३ ॥ गुल्मानां गरदोषाणामुदराणां च शान्तये । १ 'घृते जीर्णे विरिक्त तु काष्णनागरकैः' इति । २. 'शुण्ठ्या पिबेत् ततः' इति च । ३ 'पयो वा' इति पाठान्तरम् ।