भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३७ इन उपरोक्त घृतो को पीकर अनुपान रूप मे मधुर दूध या मास-रस पीना चाहिये । इस प्रकार करने से विरेचन होने पर घृत के जीर्ण हो जाने पर सोठ के साथ पकाया गरम पानी पीना चाहिये । पीछे से पेया पीनी चाहिये । फिर कुलत्थी का यूष पीये । प्रथम दिन सोठ से साधित पानी, दूसरे दिन पेया और तीसरे दिन कुलत्थी का यूष पीना चाहिये । यह स्नेह विरेचन रूक्षव्यक्ति को ही करना चाहिये । फिर दूध के साथ अन्न खाना चाहिये । इस प्रकार से तीन दिन घृत पान करे । जब तक स्निग्ध न हो जाये बार-बार घृत पान करे । कुशल वैद्य को चाहिये कि गुल्म-रोग, गर-दोषो मे, उदर रोगो की शान्ति के लिये इन सिद्धफल घृतों को बनाये ॥ १४१-१४३ ॥ पीलुश्व॰कोपसिद्धं वा घृतमानाहभेदनम् ॥ १४४ ॥ गुल्मघ्नं नीलिनीसर्पिः स्नेहं वा मिश्रकं पिबेत् । पीलु के चतुर्थांश कल्क द्वारा चतुर्गुण पानी मे सिद्ध घृत आनाह को नष्ट करता है । नीलिन्यादि-घृत तथा मिश्रक-स्नेह जा कि गुल्म-रोग मे कहे है, उनको पीना चाहिये ॥ १४४ ॥ क्रमान्निहृतदोषाणां जाङ्गलप्रतिभोजिनाम् ॥ १४५ ॥ दोषशेषनिवृत्त्यर्थं योगान्वक्ष्याम्यतः परम् । इस प्रकार से उदर-रोगी का विरेचन द्वारा शोधन होने पर जांगल मास रस के साथ अन्न देना चाहिये । इसके आगे शेष दोष की शान्ति के लिये योगों को कहने है ॥ १४५ ॥ चित्रकामदारुभ्या कल्कं क्षीरेण ना पिबेत् ॥ १४६ ॥ मासयुक्तं तथा हस्तिपिप्पली विश्वभेषजम् । ( १ ) उदर रोगी को जितेन्द्रिय होकर एक मास तक चीता और देवदारु के कल्क को अथवा हस्तिपिप्पली ( अष्टागसग्रह के मत से चविका ) और सोठ इनके कल्क का दूध के साथ पीना चाहिये १ ॥ १४६ ॥ विडङ्गं चित्रक दन्ती चव्यं व्योष च तैः समैः ॥ १४७ ॥ कल्कैः कोलसमैः पीत्वा प्रवृद्धमुदर जयेत् । ( २ ) बायावडंग, चीता, दन्ती, चव्य, सोठ, मरिच, पिप्पली प्रत्येक दो शाण लेकर चतुर्गुण जल मे दूध सिद्ध करके पीने से उदर रोग शान्त होता है ॥१४७॥ पिबेत्कषायं त्रिफलादन्तीरोहितकैः शृतम् ॥ १४८ ॥ व्योषक्षारयुतं जीर्णे रसैरद्यात्तु २ जाङ्गलैः । १. दोषशेषविजयाय च शीलयेच्चविकानागर क्षीरेण पिष्टम् । सग्रह०अ०चि०१७ २ रसैरद्यात्सजाङ्गलै इति वा ।