चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 563, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७६ गोंद ), समंगा ( मजीठ या लाजवन्ती ) और फलिनी ( प्रियंगु ) प्रत्येक द्रव्य समान भाग ( १, १ पल ) और तीनो के बराबर इन्द्रजौ का चूर्ण ( ३ पल ) इस क्वाथ मे मिलाना चाहिये । इसको अग्नि पर गरम करना चाहिये । जिस समय पकते-पकते यह अवलेह के समान हो जाये तथा कड़छी के साथ उठने लगे तो इसको उतार लेना चाहिये । इसमे से अग्नि बल के अनुसार रस-क्रिया की मात्रा खानी चाहिये । यह अवलेह रक्त को शान्त करता है । औषध के जीर्ण होने पर पेया को बकरी के दूध के साथ अथवा मण्ड के साथ पीना चाहिये । अथवा बकरी के दूध के साथ चावलो को खाना चाहिये । यह रस-क्रिया, रक्तजन्य अर्शोग को, रक्तातिसार को, रक्त सहित वेदना को ( रक्त-स्राव से उत्पन्न रोगो को ) बलवान् रक्तपित्त को चाहे वह किसी भी मार्ग से प्रवृत्त होता है, सब को शान्त करता है । ऊर्ध्वग रक्तपित्त साध्य है, अधोगामी याप्य है ॥ १८६-१६३ ॥ नीलोत्पलं समङ्गा मोचरसश्चन्दनं तिला लोध्रम् । पीत्वा छागलिपयसा भोज्यं पयसैव शाल्यन्नम् ॥ १६४ ॥ ( ४७ ) नीला कमल, समगा ( लाजवन्ती ), मोचरस (सीम्बल की गोद), तिल, पठानी लोध इनको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इसको ( ६ माशे लेकर ) बकरी के दूध के साथ पीना चाहिये । जीर्ण होने पर बकरी के दूध के साथ चावल ( हेमन्त ऋतु मे पके ) खाने चाहिये ॥ १६४ ॥ छागलिपयः प्रयुक्तं निहन्ति रक्तं सवास्तुकंरसं च । धन्वविहङ्गमृगाणां रसो निरम्लः कदम्लो वा ॥ १६५ ॥ ( ४८ ) बथुए के रस मे बकरी का दूध मिलाकर पीने से रक्तस्राव रुकता है । इसी प्रकार जागल पशु-पक्षियो के मास-रस को अनार के रस आदि से थोड़ा खट्टा बना कर अथवा बिना खट्टा किये पीने से रक्त-स्राव रुकता ॥ १६५ ॥ पाठा वत्सकबीजं रसाञ्जनं नागरं यवान्यश्च । बिल्वमिति चार्शसैश्र्चूर्णितानि पेयानि सशूलेषु ॥ १६६ ॥ ( ४६ ) पाठा, इन्द्रजौ, रसौत, सोंठ, अजवायन और बेलगिरी इनको परस्पर समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को ( ६ माशा मात्रा में ) पानी के साथ पीने से शूलयुक्त अर्श-रोग शान्त होते हैं ॥ १६६ ॥ दार्वी किरातातिक्तं मुस्तं दुःस्पर्शकश्च रुधिरघ्नम् । रक्तेऽतिवर्तमाने शूले च घृतं विधातव्यम् ॥ १६७ ॥