भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 564

५८० चरकसंहिता [ अ० १४ (५०) दारूहल्दी, चिरायता, नागरमोथा और कौंच इनका चूर्ण या क्वाथ रक्तनाशक है । परन्तु यदि रक्त बहुत होता हो और शूल हो तो इनके क्वाथ में इन्हीं के कल्क से घृत सिद्ध करके प्रयोग करना चाहिये ॥ १६७ ॥ कुटजफलवल्ककेशरनीलोत्पललोध्रधातकीकल्कैः । सिद्धं घृतं विधेयं शूले रक्तार्शसां भिषजा ॥ १६८ ॥ (५१) वैद्य को चाहिये कि रक्तार्श में यदि शूल भी हो तो कुड़े की छाल और इन्द्रजो, नागकेशर, नीला कमल, पठानी लोध, धाय के फूल इनका कल्क मिलित १ पाव, पानी ४ सेर और घृत १ सेर लेकर घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत रक्तार्श में उत्तम है ॥ १६८ ॥ सर्पिः सदाडिमरसं सयावशूकं जयत्याशु । रक्तं सशूलमथवा निदिग्धिकादुग्धिकासिद्धम् ॥ १६६ ॥ (५२) अनार के रस में और यावशूक (जवासे) के रस में घी सिद्ध करके लेने से अथवा छोटी कटेरी और दधि के रस में सिद्ध किया घृत शूलयुक्त रक्त-स्राव को शान्त करता है ॥ १६६ ॥ लाजापेया पीता चुक्रिका केशरोत्पलैः सिद्धा । हन्त्याश्वस्रक्स्रावं तथा बलापृश्निपर्णीभ्याम् ॥ २०० ॥ (५३) चुक्रिका (चांगेरी), केशर (नागकेशर) और कमलगट्टे से सिद्ध की हुई लाजा से बनी पेया पीने से रक्तस्राव रुकता है । अथवा बला और पृश्निपर्णी द्वारा लाजा से बनी पेया को सिद्ध करके पीना चाहिये ॥ २०० ॥ ह्रीबेरबिल्वनागरनिर्यूहे साधिता सनवनीताम् । वृक्षाम्लदाडिमाम्लामम्लीकाम्ला सकोलाम्लाम् ॥ २०१ ॥ गृञ्जनकसुरासिद्धां भृष्टा यमकेन वा पिबेत्पेयाम् । रक्तातिसारशूलप्रवाहिकाशोथनिग्रहणीम् ॥ २०२ ॥ (५४) ह्रीवेर (नेत्रबाला), बेलगिरी, सोंठ इनके क्वाथ में पेया को सिद्ध करे । इस पेया को वृक्षाम्ल (समगदाना), अनारदाना, इमली, खट्टे बेर इनसे खट्टा बना कर मक्खन मिला कर पीना चाहिये । अथवा गृञ्जनक (शलजम या प्याज) के रस में सिद्ध पेया को घी और तैल यमक में भून कर पीना चाहिये। ये पेया रक्तातिसार, शूल, प्रवाहिका और शोथ को हटाती है ॥२०२॥ काश्मर्यामलकानां सकर्बुदारफलाम्लानाम् । गृञ्जनकशाल्मलीनां क्षीरिण्याश्चुक्रिकायाश्च ॥ २०३ ॥