चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८२ चरकसंहिता [ अ० १४ (६०) पलाण्डु (प्याज) अकेला स्वतन्त्र रूपमे अथवा मास-रस खड, यूष वा यवागू के साथ लेने से अति रक्तस्राव और वायु का शमन करता है ॥२०६॥ छागान्तराधितरुणं सरुधिरमुपसाधितं बहुपलाण्डु । व्यत्यासान्मधुराम्ल विट्शोणितसङ्क्षये देयम् ॥२१०॥ (६१) जवान बकरी के शरीर का मध्य भाग ( यकृत् भाग और फेफड़े ) रक्त सहित लेकर प्याज के साथ सिद्ध करना चाहिये । मल और रक्त का क्षय होने पर क्रमशः मधुर तथा अम्ल रूप मे प्रयोग करना चाहिये । प्रथम मधुर देना चाहिये, पीछे अम्ल और फिर मधुर फिर अम्ल इस प्रकार से देना चाहिये २१० नवनीततिलाभ्यासात्केसरनवनीतशर्कराभ्यासात् । दधिसरमथिताभ्यासादर्शारस्यपयान्ति रक्तानि ॥२११॥ (६२) रक्तजन्य अर्शों के लिये तीन योग—( १ ) मक्खन और तिल का चूर्ण नित्य प्रति खाना चाहिये । ( २ ) नागकेशर, मक्खन और मिश्री नित्य खानी चाहिये । ( ३ ) दही की मलाई का मथ कर प्रतिदिन खाने से रक्तजन्य अर्श शान्त होते है ॥ २११ ॥ नवनीतघृतं छागं मांसं सषष्टिकः शालिः । तरुणश्च सुरामण्डस्तरुणी च सुरा निहन्त्यस्रम् ॥२१२॥ ( ६३ ) नवनीत (ताजा मक्खन ), घी ( बकरी का ), बकरी का मास, साठी चावल, तरुण सुरामण्ड ओर तरुणसुरा ( जो पुरातन न हो ) ये रक्तस्राव को नष्ट करते है ॥ २१२ ॥ प्रायेण वातबहुलान्यर्शांसि भवन्त्यतिस्रुते रक्ते । दुष्टेऽपि कफपित्ते तस्मादनिलोऽधिको ज्ञेयः॥२१३॥ कफ, पित्त, दूषित होने पर भी रक्त का अधिक स्राव होने से प्राय. अर्श में वायु की प्रबलता हो जाती है, इसलिये वायु को मुख्य समझना चाहिये २१३ दृष्ट्वा तु रक्तपित्त प्रबल कफवातलिङ्गमल्पं च । शीताः क्रियाः प्रयोज्या यथेरिता वक्ष्यते चान्या ॥२१४॥ मधुकं सपञ्चवल्कं बदरीत्वगुदुम्बर धवपटोलम् । परिषेचने विदध्याद् वृषककुभमयवासनिम्बांश्च ॥२१५॥ यदि रक्त, पित्त प्रबल हों, वायु और कफ के लक्षण मन्द हो तो पूर्वकथित तथा अन्य आगे कहे जाने वाली शीतल क्रियाये बरतनी चाहिये । ( ६४ ) मुलहठी, पचवल्कल ( बरगद, गूलर, पीपल, पारस पीपल, जामुन इनकी छाल ), बेर की छाल, गूलर, धव ( धवा ), पटोल, वासा, ककुभ