भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८३ ( अर्जुन ), यवास ( जवासा ) और नीम की छाल इनका क्वाथ करके परि- षेचन करना चाहिये ॥ २१४-२१५ ॥ रक्तेऽतिवर्तमाने दाहे क्लेदेऽवगाहयेच्चापि । मधुकमृणालपद्मकचन्दनकुशकाशनिःक्वाथे ॥ २१६ ॥ इक्षुरसमधुकवेतसनिर्यूहे शीतले पयसि वा तम् । अवगाहयेत्प्रदिग्धं पूर्वं शिशिरेण तैलेन ॥ २१७॥ ( ६५ ) रोगी को जलन हो, रक्त का अतिस्राव होता हो, आर्द्रता हो तो मुलहठी, मृणाल ( कमलनाल ), पद्माख, चन्दन, कुश और काश इनके क्वाथ मे रोगी को अवगाहन कराना चाहिये । अथवा शरीर पर चन्दनादि शीतल द्रव्यो से साधित शीतल तैल लगवा कर रोगी को शीतल दूध मे या जल मे अथवा गन्ने का रस, मुलहठी और अम्लवेतस इनके शीतल क्वाथ में अवगाहन देना चाहिये ॥ २१६-२१७ ॥ दत्त्वा घृत सशर्करमुपस्थदेशे त्रिके च गुददेशे । शिशिरजलस्पर्शसुखा धारा प्रस्तम्भनी योज्या ॥ २१८ ॥ ( ६६ ) उपस्थ प्रदेश ( शिश्न भाग पेड़ू से सम्पूर्ण निचला प्रदेश ), गुदा ओर त्रिक ( कूल्हा ) प्रदेश पर शर्करा मिश्रित घृत मिलाकर लेप करना चाहिये । फिर इन स्थानों पर ठण्डे जल की धारा जो सहन हो सके बल से गिरानी चाहिये । इस प्रकार करने से रक्तस्राव रुक जाता है। जल-धारा बहुत तीव्र नही गिरानी चाहिये ॥ २१८ ॥ कदलीदलरभिनवः पुष्करपत्रैश्च शीतजलसिक्तैः । प्रच्छादनं मुहुर्मुहुरिष्टं पद्मोत्पलदलैश्च ॥ २१६ ॥ ( ६७ ) केले के नये कोमल पत्ता या कमल के पत्तों को शीतल जल से गीला करके अथवा पद्म और उत्पल के पत्तो से उपस्थ प्रदेश, गुदा और त्रिक- भाग पर बार बार रखना चाहिये । पुनः गरम होने पर उनका हटा कर फिर नये पत्ते रखने चाहिये ॥ २१६ ॥ दूर्वाघृत प्रदेहः शतधौतसहस्रधोतमपि सर्पिः । व्यजनपवनश्च शीतो रक्तस्राव जयत्याशु ॥ २२० ॥ ( ६८ ) दूर्वा के घृत का लेप, शतधौत या सहस्रधौत घृत का लेप अर्श मे करना चाहिये । इस प्रकार से पंखे की शीतल वायु रक्तस्राव को शान्त करती है ॥ २२० ॥ समङ्गामधुकाभ्यां तिलमधुकाभ्यां रसाञ्जनघृताभ्याम् । सर्जरसघृताभ्यां वा निम्बघृताभ्यां मधुघृताभ्यां च ॥२२१॥