भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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५८८ चरकसंहिता [अ० १४ जो खान पान वायु का अनुलोमन न करे, अग्नि को न बढाये तथा निदान कारणों मे जिसकी गणना की गई है, वह सब अर्श-रोगी के लिये अपथ्य है। वह उनका सेवन कदापि न करे ॥ २४६ ॥ तत्र श्लोकाः-अर्शसा द्विविधं जन्म पृथगायतननि च । स्थानसंस्थानलिङ्गानि साध्यासाध्यविनिश्चयः ॥ २५० ॥ अभ्यङ्गाः स्वेदनं धूमाः सावगाहाः प्रलेपनाः । शोणितस्यावसेकश्च योगा दीपनपाचनाः ॥ २५१ ॥ पानान्नविधिरुग्र्यश्च वातवर्चोऽनुलोमनः । योगाः संशमनीयाश्च सर्पींषि विविधानि च ॥ २५२ ॥ बस्तयस्तक्रयोगाश्च वरारिष्टाः सशर्कराः । शुष्काणामर्शसा शस्ताः स्राविणा लक्षणानि च ॥ २५३ ॥ द्विविधं सानुबन्धाना तेषां चेष्टं यदौषधम् । रक्तसंग्रहणाः क्वाथाः पेयाश्च विविधात्मकाः ॥ २५४ ॥ स्नेहाहारविधिश्चाग्र्यो योगाश्च प्रतिसारणाः । प्रक्षालनावगाहाश्च प्रदेहाः सेचनानि च ॥ २५५ ॥ अतिवृत्तस्य रक्तस्य विधातव्यं यदौषधम् । तत्सर्वमिह निर्दिष्टं गुदजानां चिकित्सिते ॥ २५६ ॥ उपसहार-दो प्रकार के अर्श-रोग की उत्पत्ति, पृथक् पृथक् इनके कारण, स्थान, आकृति, लक्षण, साध्य-असाध्य, अभ्यग, स्वेदन, धूम प्रयोग, अवगाहन, प्रलेप, रक्त का अवसेक, दीपन-पाचन योग, वायु और मल की अनुलोमक खान पान विधि, सशमनीय योग, नाना प्रकार के घृत, बस्तिया, तक्र-प्रयोग, शुष्क अर्श रोगियो के लिये हितकारी शर्करारिष्ट, अरिष्ट, रक्तस्राव रोगियो के लक्षण, दो प्रकार का (वायु ओर कफ का) अनुबन्ध इनमे जो चिकित्सा योग्य नहीं है, रक्तसग्राहक प्रयोग, नाना प्रकार की पेया, स्नेहपान विधि, खान- पान की श्रेष्ठ विधि, परिपेक, अवगाहन, प्रदेह, प्रतिसारण, रक्त के अति स्राव होने पर जो क्रिया करनी चाहिये, यह सब इस अर्श-रोग-चिकित्सा मे कह दिया है ॥ २५०-२५६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थानेऽ- र्शश्चिकित्सित नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥