चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 573, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५८६ पञ्चदशोऽध्यायः अथातो ग्रहणीचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे ग्रहणी-चिकित्सा की व्याख्या करते हैं। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ आयुर्वर्णो बलं स्वास्थ्यमुत्साहोपचयौ प्रभा । ओजस्तेजोऽग्नयः प्राणाश्चोक्ता देहाग्निहेतुकाः ॥ ३ ॥ आयु, वर्ण, बल, स्वास्थ्य, उत्साह, उपचय (पुष्टि), प्रभा, ओज, तेज, अग्निया और प्राण इन सब की स्थिति का कारण देह की जाठर अग्नि ही है १॥३॥ शान्तेऽग्नौ म्रियते युक्ते चिरं जीवत्यनामयः । रोगी स्याद्विकृते मूलमग्निस्तस्मान्निरुच्यते ॥ ४ ॥ अग्नि के शान्त होने पर प्राणी मर जाता है और अग्नि के युक्त अर्थात् समभाव मे रहने पर प्राणी देर तक नीरोग रह कर जीता है। अग्नि के विकृत होने (मन्द या तीक्ष्ण अथवा विषम हो जाने) पर मनुष्य रोगी हो जाता है। इसलिये देहाग्नि को आयु, वर्ण, बल आदि का प्रधान कारण कहा जाता है ॥४॥ यदन्नं देहधात्वोजोबलवर्णादिपोषकम् । तत्राग्निर्हेतुराहारान्न ह्यपक्वाद्रसादयः ॥ ५ ॥ जो अन्न (भुक्त द्रव्य) देह के धातु, ओज, बल, वर्ण आदि का पोषक है, वहा पर भी यही अग्नि कारण है। क्योकि बिना पचे आहार से रस-आदि धातुओं की उत्पत्ति नही होती ॥ ५ ॥ अन्नमादानकर्मा तु प्राणः कोष्ठं प्रकर्षति । तद्द्रवैर्भिन्नसंघातं स्नेहेन मृदुतां गतम् ॥ ६ ॥ समानेनावधूतोऽग्निरुदीर्यः पवनेन तु । काले भुक्तं समं सम्यक् पचत्यायुर्विवृद्धये ॥ ७ ॥ आहार की परिपाक-विधि—आदान (ग्रहण करना) कर्म वाला प्राण वायु अन्न को कोष्ठ (आमाशय) मे ले जाता है। यह अन्न द्रव-समूहों से (क्लेदक कफ के द्रव भाग से) मिल कर छिन्न भिन्न होकर टुकड़े २ हो जाता १. गीता—अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥