भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 574, कुल 616 में से

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पृष्ठ 574

५६० चरकसंहिता [ अ० १५ है और स्नेह द्वारा ( क्लेदक-कफ के स्निग्ध भाग के कारण ) यह अन्न कोमल हो जाता है । उचित काल मे समयोग अर्थात् उचित मात्रा मे खाये हुए इस मृदु आहार को समान नामक वायु से प्रज्वलित जाठर अग्नि आयु की वृद्धि के लिये भली प्रकार से पचाता है १ ॥ ६-७ ॥ एवं रसमलायान्नामाशयस्थमधःस्थितः । पचत्यग्निर्यथा स्थाल्यामोदनायाम्बुतण्डुलम् ॥ ८ ॥ अन्नस्य भुक्तमात्रस्य षड्रसस्य प्रपाकतः । मधुरात्प्राक् कफोद्भावात्फेनभूत उदीर्यते ॥ ९ ॥ परं तु पच्यमानस्य विदग्धस्याम्लभावतः । आशयाच्च्यवमानस्य पित्तमच्छमुदीर्यते ॥ १० ॥ जिस प्रकार पतीली मे रक्खे जल और चावलो को नीचे जलती हुई अग्नि पका कर भात मे बदल देती है, उसी प्रकार यह जाठराग्नि आमाशय मे स्थित आहार को पका कर ( जीर्ण करके ) रस और मल मे बदल देती है । आहार के प्रसाद भाग से रस बनता और शेष मल बन जाता है २ । खाते समय ही छ. रस वाले अन्न के प्रथम पाक काल मे सबसे पूर्व मधुर रस ( माधुर्य ) उत्पन्न होता है । [ थूक का 'टाईलीन' भोजन के निशास्ता भाग को शर्करा मे बदल देता है ] । इससे झाग के समान कफ उत्पन्न होता है । पीछे से पचता हुआ यह अन्न विदग्ध होकर ( आमाशय मे पहुच कर आमाशयिक रस की क्रिया होने पर ) अम्ल-भाव मे परिणत हो जाता है । यह अम्लभूत अन्न जब आमाशय से निकल कर पच्यमानाशय ( ग्रहणी के आन्त्र भाग ) में आता है तब स्वच्छ पित्त बढता है ३ ॥ ८-१० ॥ १. आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा ऊष्मा वायुः क्लेद स्नेहः काल. समयोगश्चेति ( चक्र० ) । २. कई आचार्य अन्न के पाक से तीन भागों की उत्पत्ति मानते हैं, स्थूल, सूक्ष्म और मल-भाग । जिस प्रकार गन्ने के रस को पकाने से उस पर बार-बार मलाई आती है, इसी प्रकार धातुओं के अग्नि द्वारा परिपाक होने पर अन्न के तीन भाग हो जाते हैं । ( १ ) सूक्ष्म भाग अगली धातु मे जाता है और ( २ ) स्थूल भाग उसी धातु का पोषण करता है । ( ३ ) मल भाग बाहर हो जाता है । अन्त मे शुक्राग्नि के पाक से स्थूल और सूक्ष्म दो ही भाग बनते हैं मल भाग नही रहता है । ३. पच्यमानाशय में आहार रस की क्रिया क्षारीय बन जाती है । इसमे