चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 579, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५६५ द्रवद्रक्तात्स्थिरं मांसं कथं तज्जायते नृणाम् ॥ २३ ॥ द्रवधातोः स्थिरान् मांसान्मेदसः संभवः कथम् १। श्लक्ष्णाभ्या मासमेदोभ्यां खरत्वं कथमस्थिषु ॥ २४ ॥ खरेष्वस्थिषु मज्जा च केन स्निग्धो मृदुस्तथा । मज्जश्च परिणामेन यदि शुक्रं प्रवर्तते ॥ २५ ॥ सर्वदेहगतं शुक्रं प्रवदन्ति मनीषिणः । तथाऽस्थिमध्ये मज्जश्च शुक्रं भवति देहिनाम् ॥ २६ ॥ छिद्रं न दृश्यतेऽस्थ्नां च तन्निःसरति वा कथम् । जब भगवान् आचार्य इस प्रकार से कह चुके तब शिष्य अग्निवेश ने पूछा हे भगवन् ! इस शरीर मे रक्त के समान रस नही होता, फिर रस से रक्त बनता है यह कैसे ? रस मे कोई रग या लालिमा नही है, फिर वह लाल कैसे हो जाता है । द्रवरूप रक्त से कठिन मास-वस्तु किस प्रकार से पुरुषों मे बन जाती है । स्निग्ध चिकने मास और मेद से अस्थियो मे खरता कैसे उत्पन्न हो जाती हे ? खुरदरी अस्थियो मे स्निग्ध और कोमल मज्जा कैसे आ जाती है ? और यदि मज्जा के परिणाम से ही शुक्र बनता है, तो बुद्धिमान लोग शुक्र को सम्पूर्ण देह मे व्याप्त क्यो कर बतलाते है ? अस्थियो के मध्य मे और मज्जा मे भी शुक्र रहता है, परन्तु अस्थियो मे कोई छिद्र दिखाई नही देता, फिर वह उनसे कैसे निकलता है ॥ २२-२६- ॥ एवमुक्तस्तु शिष्येण गुरुः प्राहैदमुत्तरम् ॥ २७ ॥ तेजो रसानां सर्वेषा मनुजानां यदुच्यते । पित्तोष्मणः स रागेण रसो रक्तत्वमृच्छति ॥ २८ ॥ शिष्य अग्निवेश के इस प्रकार पूछने पर भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया कि सब मनुष्यों मे जो रसों का तेज है, उससे तथा पित्त की उष्णिामा के राग के कारण यह रस रक्तता को प्राप्त करता है । [ रसों का तेज ही पित्त है । क्योकि सुश्रुत मे कहा है—पित्त से अतिरिक्त और कोई अग्नि इस शरीर मे उपलब्ध नही होती । इसलिये रस रक्त की अग्नि से ही परिपाक होने पर रक्तवर्ण हो जाता है । जैसा कि सुश्रुत मे कहा है— यकृत् और प्लीहा में पहुंच कर यह रस रक्तवर्ण हो जाता है ] ॥ २७-२८ ॥ वाय्वम्बु२ तेजसा रक्तमूष्मणा चाभिसंयुतम् । स्थिरतां प्राप्य मांसं स्यात्स्वोष्मणा पक्वमेव तत्३ ॥ २९ ॥ १. 'रसात् रक्तात् तथा मांसान्मेदस' श्चेतता कथम्' इति च । २. 'वाय्वग्नि- तेजसा' इति च । ३ 'स्थिरतो प्राप्य शौक्ल्य च मेदो देहेऽभिजायते' इति च ।