भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 580

५६६ चरकसंहिता [ अ० १५ स्वतेजोऽम्बुगुणस्निग्धोद्रिक्तं मेदोऽभिजायते । पृथिव्यग्न्यनिलादीनां संघातः स्वोष्मणा१ कृतः ॥ ३० ॥ खरत्वं प्रकरोत्यस्य जायतेऽस्थि ततो नृणाम् । करोति तत्र सौषिर्यमस्थ्नां मध्ये समीरणः ॥ ३१ ॥ मेदसस्तानि पूर्यन्ते स्नेहो मज्जा ततः स्मृतः । यस्मान्मज्जस्तु यः स्नेहः शुक्रं संजायते ततः ॥ ३२ ॥ यह रक्त वायु, जल, तेज और उष्णिमा से मिल कर स्थिरता को प्राप्त करके मांस रूप हो जाता है। यही मांस अपनी उष्णिमा से पक कर अपने मांस के तेजोगुण और जलीय गुण की स्निग्धता के बढ़ने पर मेदरूप हो जाता है। इसी मेद की उष्णिमा से पृथिवी, अग्नि, वायु आदि का संघात होकर यह मेद खर (कठिन) हो जाता है, जिससे मनुष्यों की अस्थियां बनती हैं। इन अस्थियों के मध्य में वायु छिद्र उत्पन्न कर देता है। यह छिद्र-भाग मेद से भर जाते हैं। उससे स्नेह रूप मज्जा उत्पन्न होती है। इस मज्जा का जो स्नेह- भाग है, उससे शुक्र की उत्पत्ति होती है ॥ २६-३२ ॥ वाय्वाकाशादिभिर्भावैः सौषिर्यं जायतेऽस्थिषु । तेन स्रवति तच्छुक्रं नवात्कुम्भादिवोदकम् ॥ ३३ ॥ स्रोतोभिः स्यन्दते देहात्समन्ताच्छुक्रवाहिभिः । वायु, आकाश आदि के कारण अस्थियों में सच्छिद्रता होती है। इन छिद्रों से शुक्र ऐसे ही टपकता है, जैसे नये घड़े से जल टपकता है ॥ ३३ ॥ हर्षोद्दारितं वेगात्सङ्कल्पाच्च मनोभवात् ॥ ३४ ॥ विलीनं घृतवद् व्यायामोष्मणा स्थानविच्युतम् । बस्तौ संभृत्य निर्याति स्थलान्निम्नमिवोदकम् ॥ ३५ ॥ यह उत्पन्न शुक्र इन्द्रिय की उत्तेजना और काम-संकल्प के कारण उत्पन्न हुए प्रहर्ष (उत्तेजना) से प्रेरित होकर सम्पूर्ण शरीर से शुक्रवाही-स्रोतों द्वारा वेग से आता है। जिस प्रकार ऊंचे स्थान से जल नीचे की ओर बहकर निकल जाता है, उसी प्रकार (योनि सङ्घर्ष आदि रूप) व्यायाम से उत्पन्न उष्णिमा से घी के समान द्रवीभूत होकर तथा अपने स्वाभाविक स्थान से खिसक कर वीर्य बस्तिदेश में एकत्र होकर मूत्रमार्ग से निकल जाता है२ ॥ ३४-३५ ॥ १. 'श्लेष्मणा' इति च । २. सुश्रुत मे भी कहा है— 'जिस प्रकार दूध में घी और गन्ने के रस में गुड़ छिपा रहता है इसी प्रकार पुरुषों के शरीर में शुक्र को समझें, वह सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है।'