भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 582

५६८ चरकसंहिता [ अ० १५ इन तीनो प्रकार की अग्नियो में से प्रधान अग्नि१ अन्न का पाचक जाठ- राग्नि ही है। इस जाठराग्नि पर ही शेष अग्नियां निर्भर है। इस जाठराग्नि के बढ़ने पर ये बढते हैं और इसके घटने पर ये घट जाते है। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि प्रयत्नपूर्वक विधि से अति हितकारी अन्नपान रूपी इन्धन के द्वारा इस जाठराग्नि की सदा रक्षा करे। क्योकि इसी अन्न-पाचक जाठराग्नि की स्थिति पर बल और आयु की स्थिति निर्भर है। जो मनुष्य विधि का त्याग करके आहार का सेवन करते हे, वे लोभवश ग्रहणी के दोष से उत्पन्न होने वाले रोगो से पीड़ित होते है। [ ग्रहणी दोष से उत्पन्न होने वाले चार प्रकार के रोगा का वर्णन आगे करेग ] ॥ ३६-४१ ॥ अभोजनादजीर्णातिभोजनाद्विषमाशनात् । असात्म्यगुरुशीतातिरूक्षसंदुष्टभोजनात् ॥ ४२ ॥ विरेकवमनस्नेहविभ्रमाद् व्याधिकर्शनात् । देशकालर्तुवैषम्याद् वेगानां च विधारणात् ॥ ४३ ॥ दुष्यत्यग्निः स दुष्टोऽन्नं न तत्पचति लघ्वपि । अपच्यमानं शुक्तत्वं यात्यन्नं विषतां च तत् ॥ ४४ ॥ अजीर्ण के सामान्य कारण—भोजन न करने से ( उपवास से ), अजीर्ण मे ( प्रथम भोजन के जीर्ण न होने पर ) भोजन करने से, अति- भोजन से, विषमाशन से ( बहुत थोड़ा या अकाल मे भोजन से ), असात्म्य भोजन से, गुरु, शीत भोजन अथवा अति भोजन से, दूषित ( बासी या दूषित ) भोजन से, विरेचन, वमन अथवा स्नेह क विधिपूर्वक प्रयोग न करने से, किसी रोग के कारण कृशता या निर्बलता हो जाने मे, देश, काल अथवा ऋतु की विषमता से, मल, मूत्र आदि के उपस्थित वेगो को रोकने से अग्नि दूषित हो जाती है। यह दूषित अग्नि थोडे से भी आहार का परिपाक नही करता । परि- पाक न होने से अन्न शुक्त अर्थात् अम्लीभाव से युक्त हो जाता है तथा इसमें विष के गुण आ जाते है। अर्थात् अपरिपक्व अन्न मृत्यु का भी कारण हो सकता है२ ॥ ४२-४४ ॥ १ 'भौतिकाः पञ्च, धात्वग्नयः सप्त, अन्नपक्ता एकः । अग्नयः इति भूताग्नयः पञ्च, धात्वग्नयः सप्त इति द्वादशाग्नयः ।' इति च चक्रः० ॥ २ अन्यत्र भी कहा है— मूर्च्छा प्रलापो वमथुः प्रसेकः सदन भ्रमः । उपद्रवा भवन्त्येते मरणं चाप्यजीर्णतः ॥