चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 583, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] चिकित्तिसस्थानम् ५६६ तस्य लिङ्गमजीर्णस्य विष्टम्भः सदनं तथा । शिरसो रुक् च मूर्च्छा च भ्रमः पृष्ठकटिग्रहः ॥ ४५ ॥ जृम्भाऽङ्गमर्दस्तृष्णा च ज्वरश्छर्दिः प्रवाहणम् । अरोचकोऽविपाकश्च । सामान्य लक्षण—विष्टम्भ ( अन्नका कोष्ठ मे रुका रहना ), सदन ( शिथि- लता ), शिर मे दर्द, मूर्च्छा, भ्रम, पीठ मे वेदना, कमर मे दर्द, जम्भाई का आना, अङ्गों मे पीड़ा, प्यास, ज्वर, वमन, प्रवाहण ( बार-बार पतला मल आना ), अरुचि और अविपाक ( भोजन का ठीक पाक न होना ) ये अजीर्ण के सामान्य लक्षण है ॥ ४५-॥ घोरमन्नविषं च तत् ॥ ४६ ॥ संसृज्यमानं पित्तेन दाहं तृष्णा मुखामयान् । जनयत्यम्लपित्तं च पित्तजांश्चापरान् गदान् ॥ ४७ ॥ यक्ष्मपीनसमेहादीन्कफजान्कफसङ्गतः । करोति वातसंसृष्टं वातजांश्चापरान् गदान् १ ॥ ४८ ॥ मूत्ररोगांश्च मूत्रस्थं कुक्षिरोगान् शकृद्गतम् । रसादिभिश्च संसृष्टं कुर्याद्रोगान् रसादिजान् ॥ ४६ ॥ यह अन्न अब भयानक विष के समान हो जाता है। जिस समय यह अन्न- विष पित्त के साथ मिल जाता है, तब जलन, प्यास तथा मुख के रोगों को ओर अम्लपित्त को तथा पित्तजन्य अन्य विकारो को उत्पन्न करता है२ । कफ के साथ मिल कर यह अन्न-विष यक्ष्मा३, पीनस, प्रमेह आदि कफजन्य रोगा को उत्पन्न करता है । यह अन्नविष वायु के साथ मिल कर विष्टम्भ आदि पूर्व कहे लक्षणो के साथ वात से उत्पन्न शूल, अफ़ारा आदि अन्य अनेक रागों को उत्पन्न करता है । १. 'वातजांश्च गदान् बहून्' इति वा । २ अम्ल-पित्त के लक्षण दूसरे ग्रन्थ मे इस प्रकार हैं—'अविपाकक्लमत्क्लेदतिक्ताम्लोद्गारगौरवैः । हृत्कण्ठदाहरुचिमिश्चाम्लपित्त विनिर्दिशेत् ॥' भोजन का न पकना, क्लान्ति होना, वमन की सी इच्छा, खट्टे डकार, भारीपन, हृदय और गले मे जलन और भोजन की अनिच्छा आदि लक्षणों से अम्ल-पित्त को जाने । ३. यक्ष्मा-रोग त्रिदोषज होता है तो भी स्रोतो के रुकने पर कफ ही मुख्य उपद्रव उत्पन्न करता है इसलिये उसको कफजन्य कहा है ( चक्र० ) ।