भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 584, कुल 616 में से

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पृष्ठ 584

६०० चरकसंहिता [अ० १५ यह अन्न-विष मूत्र मे स्थित होकर मूत्रसम्बन्धी रोगों को, मल मे आश्रित होकर उदर रोगों को, रस, रक्त आदि धातुओ मे आश्रित होकर रस आदि से उत्पन्न होने वाले रोगों को उत्पन्न करता है१ ॥ ४६-४९ ॥ विषमो धातुवैषम्यं करोति विषमं पचन्। तीक्ष्णो मन्धेन्धनो धातून्विशोषयति पावकः॥ ५०॥ विषम अग्नि अन्न का पाक विषम रूप मे करके धातुओ मे भी विषमता उत्पन्न कर देता है। तीक्ष्णाग्नि को यदि आहार रूप इन्धन न मिले तो वह धातुओं को ही सुखाने लगता है ॥५०॥ युक्तं भुक्तवतो युक्तो धातुसाम्यं समं पचन्। दुर्बलो विदहत्यान्नं तद्यात्यूर्ध्वमधोऽपि वा॥ ५१॥ युक्त अर्थात् समाग्नि, हित और मात्रा मे खाये युक्त आहार को समता से परिपाक करके धातुओं को समानावस्था मे रखता है। दुर्बल अग्नि अन्न को विदग्ध करता है, यह विदग्ध अन्न या तो ऊर्ध्वमार्ग से (वमन के रूप मे) निकल जाता है या अधोमार्ग, गुदा द्वार से विरेचन के रास्ते मलरूप मे बाहर होता है॥ ५१॥ अधस्तु पक्वमामं वा प्रवृत्तं ग्रहणीगदः। उच्यते सर्वमेवान्नं प्रायो ह्यस्य विदह्यते॥ ५२॥ जब विदग्ध अन्न पके वा कच्चे मल के रूप मे नीचे के गुदा-मार्ग से निकलता है, तब उसको 'ग्रहणी' रोग कहते है। इस ग्रहणी-रोग मे सब प्रकार का अन्न प्रायः विदग्ध हो जाता है। रोगी स्निग्ध, रूक्ष, गुरु या लघु जो भी कुछ खाता है वह सब विदग्ध हो जाता है ॥५२॥ अतिसृष्टं विबद्धं वा द्रवं तदुपवेश्यते। तृष्णारोचकवैरस्यप्रसेकतमकान्वितः॥ ५३॥ शूनपादकरः सास्थिपर्वरुक् छर्दनं ज्वरः। लोहाम२गन्धिस्तिक्ताम्ल उद्गारश्चास्य जायते॥ ५४॥ ग्रहणी के लक्षण—ग्रहणी के रोगी का मल बहुत पतला अथवा बंधा हुआ या पानी के समान द्रवरूप होता है। रोगी को प्यास, अरुचि, मुख मे विरसता, मुख मे थूक का बहुत आना और तमक-श्वास रहता है। रोगी के हाथ-पाय पर १ रोगो के लिये देखिये चरक सूत्रस्थान अ० २८ ॥ २. 'लोहाम' इति पाठान्तरम् । 'लोहानुगन्धि' शब्द का अर्थ 'लोहे के समान गन्ध' यह अर्थ आयुर्वेदाचार्य जयदेवजी ने किया है।