चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 586, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें६०२ चरकसंहिता [अ० १५ वातात्पित्तात्कफाच्च स्यात्तद्रोगस्त्रिभ्य एव च१ । हेतुं लिङ्गं चिकित्सां च शृणु तस्य पृथक् पृथक् ॥ ५८ ॥ ग्रहणी रोग के भेद—ग्रहणी-रोग चार प्रकार का है (१) वातजन्य, (२) पित्तजन्य, (३) कफजन्य और (४) सन्निपातजन्य,। अब इन चारों के कारण, लक्षण और चिकित्सा पृथक् सुनो ॥ ५८ ॥ कटुतिक्तकषायातिरूह्क्षशीताल्प२ भोजनैः । प्रमिताशनात्याध्ववेगनिग्रहमैथुनैः ॥ ५६ ॥ मारुतः कुपितो वह्नि संछाद्य कुरुते गदान्३ । (१) वातजन्य ग्रहणी—कटु, तिक्त, कषाय, अति रूक्ष, अति शीत, अति अल्प भोजन से, मात्रा से न्यून भोजन से, अनशन (उपवास) से बहुत अधिक यात्रा या परिश्रम से, मल मूत्रादि के वेगो को रोकने से तथा अति मैथुन से कुपित हुआ वायु अग्नि का छाद कर उसको मन्द करके अनेक रोगों को उत्पन्न करता है ॥ ५६- ॥ तस्यान्नं पच्यते दुःखं शुक्तपाकं खराङ्गता ॥ ६० ॥ कण्ठास्यशोषः क्षुत्तृष्णा तिमिरं कर्णयोः स्वनः । पार्श्वोरुवंक्षणग्रीवारुजोऽभीक्ष्णं विसूचिका ॥ ६१ ॥ हृत्पीडा कार्श्यदौर्बल्यं वैरस्यं परिकर्तिका । गृद्धिः सर्वरसानां च मनसः सदं तथा ॥ ६२ ॥ जीर्णे जीर्यति चाध्मानं भुक्ते स्वास्थ्यमुपैति च । स वातगुल्महृद्रोगप्लीहाशङ्की च मानवः ॥ ६३ ॥ चिराद् दुःखं द्रवं शुष्कं तन्वामं शब्दफेनवत् । पुनः पुनः सृजेद्वर्चः कासश्वासार्दितोऽनिलात् ॥ ६४ ॥ रस अग्नि गुण वाले अर्थात् क्षारीय होते है इसलिये ग्रहणी को अग्नि का आश्रय स्थान कहा है। इसी अग्नि पर ग्रहणी आश्रित है अर्थात् इन रसों के आने ही से उसका 'ग्रहणी' नाम सार्थक होता है। जैसा कि सुश्रुत मे कहा है— षष्ठी पित्ता धरा नाम या कला परिकीर्त्तिता । पक्वामाशयमध्यस्था ग्रहणी सा प्रकीर्त्तिता ग्रहण्या बलमग्निर्हि स चापि ग्रहणीं श्रितः । तस्मात्सदूषिते वह्नौ ग्रहणी सम्प्रदुष्यति ॥ सु० उ० अ० ४० ॥ १. 'वातात् पित्तात् कफात्सर्वाद् ग्रहणीदोष उच्यते' इति पाठान्तरम् । २ 'शीतल' इति वा पाठः । ३. 'करोति कुपितो मन्दमग्निं संछाद्य मारुतः' इति पाठान्तरम् ।