चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 587, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०३ लक्षण—वातजन्य ग्रहणी मे अन्न का परिपाक बहुत कठिनता से होता है । पकने पर अन्न शुक्त (अम्लीभाव) हो जाता है। अगों मे रूक्षता, कर्कशता आ जाती है । गला और मुख सूखा रहता है, भूख और प्यास बढ जाती है, आखो के सामने अन्धेरा आता या दृष्टि मन्द हो जाती है, कानो मे गुजार रहती है, पासो मे, जघाओ मे, वक्षण और ग्रीवा मे दर्द रहती है बार बार विसूचिका अर्थात् पतला मल तथा वमन आने की शिकायत रहती है । हृदय मे ( आमाशय के कौड़ी भाग पर ) वेदना, दुर्बलता, कृशता मुख मे विरसता और कोष्ठ मे कर्तन के समान वदना होती ह । मधुर आदि सब रसो की खान का वाह रोगी करता है, मानसिक शिथिलता आ जाती है । भोजनके जीर्ण होजाने पर या जीर्णावस्था मे आध्मान (अफरा) होता है । भोजनके करने पर रोगी को स्वास्थ्य का अनुभव होता है । रोगी को वातगुल्म, हृदयरोग और प्लीहा-रोग कॊ आशका नीं रहती है । रोगी बड़ी कठिनाई से बहुत देर मे पतला, शुष्क, पानी के समान, कच्चा, शब्द और झाग मिले मल का बार-बार त्याग करता है । रोगी को खासी और श्वास की शिकायत रहती है ॥ ६०–६४ ॥ कट्वजीर्णाविदाह्यम्लक्षाराद्यैः पित्तमुल्बणम् । अभिमालावयदन्ति जलं तप्तमिवानलम् ॥ ६५ ॥ (२) पैत्तिक-ग्रहणी—कटु, अजीर्ण, विदाही, अम्ल तथा क्षार आदि के सेवन बढा हुआ पित्त अग्नि को आप्लावित करके उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे गरम पानी अग्नि को शान्त कर देता ह । पित्त-प्रकोपक वस्तुओ से पित्त मे उष्णिमा और द्रवाश दोनो बढते है । द्रवाश के कारण अग्नि बुझ जाती है ॥६५॥ सोऽजीर्णं नीलपीताभं पीताभः सार्यते द्रवम् । पूत्यम्लोद्गारहृत्कण्ठदाहारुचितृडर्दितः ॥ ६६ ॥ लक्षण—रोगी का वर्ण पीला या नीला सा हो जाता है उसका मल पीला तथा पानी जैसा पतला होता है । रोगी का उद्गार ( डकार ) दुर्गन्धयुक्त और खट्टा होता है, हृदय और गले मे जलन होती है । रोगी का अरुचि और प्यास सताती है ॥ ६६ ॥ गुर्वतिस्निग्धशीतादिभोजनादतिभोजनात् । भुक्तमात्रस्य च स्वप्नाद्धन्त्यग्निं कुपितः कफः ॥ ६७ ॥ ( ३ ) कफजन्यग्रहणी—गुरु, शीत, अति स्निग्ध भोजन के सेवन से अथवा अतिभोजन से, और भोजन के उपरान्त तुरन्त सो जाने से कुपित हुआ कफ अग्नि को नष्ट करता है ॥ ६७ ॥