चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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४४ चरकसंहिता [ अ० ३
यह गर्भ आत्मा से उत्पन्न है, गर्भ के आत्मा को ही अन्तरात्मा कहते हैं,
यही जीव है । इसीको शाश्वत , अज, अमर, अक्षय, अभेद्य, अच्छेद्य, अलोढ्य,
विश्वरूप, विश्वकर्मा, अव्यक्त, अनादि, अनिधन, अक्षर आदि पर्य्यायो से कहते
हैं । यह अन्तरात्मा जीव, गर्भाशय में प्रविष्ट होकर शुक्रशोणित के साथ मिलकर
अपने आप को रूप मे उत्पन्न करता है । इसलिये गर्भ में इसका नाम 'आत्मा'
है । इस आत्मा के अनादि होने से इस का जन्म नहीं होता । इसलिये वह
स्वयं उत्पन्न न होकर भी आत्मा गर्भ को ही उत्पन्न करता है, स्वयं उत्पन्न हुए
बिना ही वह न उत्पन्न हुए गर्भ को उत्पन्न करता है । यह गर्भ कालक्रम से
बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त होता है । यह जिस जिस
अवस्था में रहता है, उस उस अवस्था मे उत्पन्न हुआ कहा जाता है । जो
अवस्था इसकी आगे भविष्य में आने को होती है उसमें यह अज्ञात, अनुत्पन्न
रहता है । इस लिये वह उत्पन्न और अनुत्पन्न एक समय में दोनों ही एक
साथ रहता है । क्योकि उसमें उत्पन्न और भविष्य में उत्पन्न होना यह दोनों
धर्म रहते हैं । अत यह आत्मा उत्पन्न होकर भी अनुत्पन्न ही है और भविष्य
में आनेवाली अवस्थाओं में न उत्पन्न हो कर ही अपने को अपने आप उत्पन्न
करता है । सत् विद्यमान आत्मा का एक अवस्था से दूसरी अवस्था में विद्य-
मान रहते हुए भी उस उस आयु और उस उस अवस्था मे जाने का नाम ही
'जन्म' है और शुक्र-आर्त्तव और जीव इनके संयोग होने से पूर्व गर्भ नही
होता । इनके संयोग से ही गर्भ बनता है और जिस प्रकार पुरुष के रहते हुए
भी पुत्र के बिना हुए इसमें पितृभाव नहीं होता, पुत्र उत्पन्न होने से वह पिता
हो जाता है, इसी प्रकार आत्मा के रहते हुए भी उस उस अवस्था मे 'उत्पन्न'
होने से वह उत्पन्न और न होने से 'अनुत्पन्न' हो जाता है ॥ १५ ॥
न तु खलु गर्भस्य मातुर्न पितुर्नात्मनः सर्वभावेषु यथेष्टकारित्वमस्ति ।
ते किञ्चित्स्ववशात्कुर्वन्ति किंचित् कर्मवशात्, क्वचिच्चैषां करणशक्तेर्भव-
त्ति क्वचिन्न भवति, यत्र सत्त्वादिकरणसपत्तत्र यथाबलमेव यथेष्टकारि-
त्वमतोऽन्यथा विपर्ययः । न च करणदोषादकरणमात्मा संभवति गर्भ-
जनने, दृष्टं चेष्टयोनिरैश्वर्यं मोक्षश्चात्मविद्भिरात्मायत्तं, न ह्यान्यः
सुखदुःखयोः कर्ता, न चान्यतो गर्भो जायते जायमानः, न चाङ्कु-
रोत्पत्तिर्बीजात् ॥ १६ ॥
गर्भ के बारे में माता, पिता और आत्मा अपनी इच्छा से सब कुछ नहीं
कर सकते । वे कुछ अपनी इच्छा से करते हैं और कुछ कर्मों के वश से करते
हैं । कहीं पर इनके साधन, उपाय आदि का शक्ति स कार्य होता है और कही