चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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[Header] अ० ३ ] शारीरस्थानम् ४५
पर नहीं होता । जहां पर सत्त्व आदि साधन उत्तम होते हैं, वहा पर साधनों के
बल के अनुसार वे यथेष्ट कर सकते हैं। इस के विपरीत अर्थात् करण उत्तम
न रहने पर वे यथेष्ट नही कर सकते । इस प्रकार 'साधन के दोष से आत्मा
गर्भोत्पत्ति में कारण नहीं' यह कहना ठीक नहीं। देखा भी है कि इष्ट योनि,
ऐश्वर्य्य ( आवेश आदि ) और मोक्ष ये सब आत्मा के अधीन हैं, इसका
आत्मविद् ज्ञानियों ने साक्षात् अनुभव किया है । आत्मा के सिवाय दूसरा कोई
सुख दुख का कर्त्ता नहीं है । उत्पन्न होने वाला गर्भ आत्मा के सिवाय दूसरे
से उत्पन्न नहीं होता । जैसे बीज के बिना अंकुर की उत्पत्ति नहीं हो सकती
उसी प्रकार आत्मा के विना गर्भ उत्पन्न नहीं हो सकता ॥१६॥
यानि तु खल्वस्य गर्भस्याऽऽत्मजानि, यानि चास्याऽऽत्मतः संभ-
वत संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा-तासु तासु योनिषू-
त्पत्तिरायुरात्मज्ञानं मन इन्द्रियाणि प्राणापानौ प्रेरणं धारणमाकृतिस्वर-
वर्णविशेषाः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ चेतना धृतिर्बुद्धि स्मृतिरहङ्कारः
प्रयत्नश्चेत्यात्मजानि ॥ १७ ॥
गर्भ की जो बाते आत्मा से उत्पन्न होती हे, या आत्मा के होने पर ही
होनी संभव है, उनका वर्णन करते हैं । जैसे-मनुष्य, तिर्यग् आदि नाना
योनियों मे जन्म, आयु, आत्मज्ञान, मन, इन्द्रिया, प्राण और अपान, प्रेरण
( इन्द्रिय मन का विषयो मे प्रेरित करना ) शरीर का धारण करना आदि
[ उन्मेष, निमेष, प्रयत्न आदि कर्म भी ], नाना आकृतिया, नाना स्वर और
नाना वर्ण आदि सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, चेतना, धृति, बुद्धि, स्मृति, अहंकार
और प्रयत्न । इतनी बातें आत्मा से उत्पन्न होती है ॥ १७ ॥
सात्म्यजश्चायं गर्भः । न ह्यसात्म्यसेवित्वमन्तरेण स्त्रीपुरुषयोर्व-
न्ध्यत्वमस्ति गर्भेषु वाऽप्यनिष्टो भावः, यावत्खल्वसात्म्यसेविनां स्त्री-
पुरुषाणा त्रयो दोषाः प्रकुपिता. शरीरमुपसर्पन्तो न शुक्रशोणितगर्भा-
शयोपघातायोपपद्यन्ते, तावत्समर्था गभजननाय भवन्ति । सात्म्यसे-
विनां पुनः स्त्रीपुरुषाणामनुपहत-शुक्र-शोणित-गर्भाशयानामृतुकाले संनि-
पतितानां जीवस्यानवक्रमणाद् गर्भा न प्रादुर्भवन्ति, न हि केवलं
सात्म्यज एवायं गर्भ , समुदायोऽत्र कारणमुच्यते, यानि तु खल्वस्य
गर्भस्य सात्म्यजानि, यानि चास्य सात्म्यतः संभवतः संभवन्ति, तान्य-
नुव्याख्यास्यामः, तद्यथा-आरोग्यमनालस्यमलोलुपत्वमिन्द्रियप्रसादः
स्वर-वर्ण-बीज-संपत् प्रहर्षभूयस्त्वं चेति सात्म्यजानि ॥ १८ ॥