चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१२ चरकसंहिता [ अ० १५ चतुर्णां प्रस्थमम्लानां त्र्यूषणाञ्च पलत्रयम् । लवणानां च चत्वारि शर्करायाः पलाष्टकम् ॥ १११ ॥ संचूर्ण्य शाकसूषान्नरागादिष्ववचारयेत् । कासाजीर्णारुचिश्वासहृत्पाण्ड्वामयशूलनुत् ॥ ११२ ॥ (२१) चार प्रकार के अम्लो (वृक्षाम्ल, अम्लवेतस, अनार और बेर अथवा कैथ, चौपतिया, वृक्षाम्ल ओर अनार १) का एक प्रस्थ, सोंठ, मरिच और पिप्पली मिलित तीन पल, पांचो नमक (सैन्धव, रूचल, सामुद्र, विड् और उद्भिद) मिलित चार पल, शर्करा आठ पल मिला कर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को शाक, दाल, राग (व्यञ्जन विशेष) आदि मे मिलाना चाहिये । यह चूर्ण कास, अजीर्ण, अरुचि, श्वास, हृदयरोग, पाण्डुरोग और गुल्म को नष्ट करता है ॥ १११-११२ ॥ चव्यत्वक्पिप्पलीमूलधातकीव्योषचित्रकान् । कपित्थं बिल्वमम्बष्ठा शाल्मलं हस्तिपिप्पलीम् ॥ ११३ ॥ शिलोद्भेदं तथाऽजाजीं पिष्ट्वा बदरसंमितान् । परिभर्ज्य घृते दध्ना यवागूं साधयेद्भिषक् ॥ ११४ ॥ रसैः कार्पित्थचुक्रैकावृक्षाम्लैर्दाडिमस्य च । सर्वातिसारग्रहणीगुल्मार्शःप्लीहनाशिनी ॥ ११५ ॥ इति पञ्चप्रकारयवागूः । (२२) पाच प्रकार की यवागू—चविका, दालचीनी, पिप्पलीमूल, धाय के फूल, सोंठ, मरिच, पिप्पली और चीता, कैथ, बिल्व, पाठा, शाल्मल (सीबल का गोंद), गजपिप्पली, शिलोद्भेद (शैलेय), अजाजी (जीरा) प्रत्येक छः मासा लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को घी मे भून लेना चाहिये । फिर दही और कैथ का स्वरस, चागेरी (चापतिया) का रस, वृक्षाम्ल (समगदाना) और अनार के रस से यवागू पृथक् २ बनानी चाहिये । अथवा सब को मिश्रित करके यवागू सिद्ध करनी चाहिये । यह पाच प्रकार की यवागू सब प्रकार के आतिसार, गुल्म, मन्दाग्नि, अर्श और प्लीहा-रोग को नष्ट करती है ॥ ११३-११५ ॥ पञ्चकोलकयूषश्च मूलकाना च सोषणः । स्निग्धो दाडिमतक्राम्लो जाङ्गलः संस्कृतो रसः ॥ ११६ ॥ १. चार अम्ल—'वृक्षाम्लं मातुलुगाम्लं बदरं चाम्लवेतसम् । चतुरम्लमिदं प्रोक्त पञ्चाम्ल तु सदाडिमम् ॥'